अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 439

424 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय अध्यक्षः इसका इस बात से कोई संबंध नहीं है। वे चाहें तो अनेक बार अपना मन बदल सकते हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः माननीय सदस्य को उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए। यह जानकर सदन को प्रसन्नता होती कि मैंने जब 14 जुलाई, 1941 को बिल प्रस्तुत किया था, तो बंगाल की हिंदू जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग इसके पक्ष में था। तत्पश्चात् एक प्रवर समिति सक्षम बिल को कार्यसूची में रखा गया था। मेरे पास उस कार्यसूची के दस्तावेज की प्रतिलिपि है, जो 25 सितंबर, 1942 को जारी हुई थी। मैं तब उस स्थिति में था कि मैं उसे बंगाल विधानसभा में पारित करवा सका, जहां हिंदू मुस्लिम के समन्वय वाली पार्टी का एक बड़ा बहुमत था। पार्टी ने बहुमत के साथ बिल के पक्ष में निर्णय लिया था और उसे प्रवर समिति को भेजा जाना था। उस समय, हालांकि, बिल के विरोध में हिंदुओं की राय की पूरी तरह से छानबीन कर ली गई थी, मुझे बताया गया था कि यदि बिल पारित हुआ तो गंभीर समस्याएं उत्पन्न होंगी। तब मुझ सहित अनेक लोगों ने महसूस किया कि यदि बिल पारित हुआ, तो पुत्रियाँ और अन्य की स्थिति को लेकर विरोध के स्वर उठेंगे। इसी बीच राउ समिति की रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी थी और उनके द्वारा तैयार बिल का प्रारुप देश के सामने था। इसके संबंध में 1941 और 1942 में बड़ी संख्या में बैठकें आयोजित हुईं। एक बैठक मेरे पैतृक स्थल बर्दवान में आयोजित हुई थी और इसी प्रकार की अनेक बैठकें पूरे बंगाल में आयोजित हुईं, जिनमे मुख्य बिल का विरोध किया गया। यद्यपि मुझे अपने बिल के पक्ष में अपेक्षित बहुमत प्राप्त था, मैं इसे लेकर आगे नहीं बढ़ा क्योंकि यह केवल हिंदू समुदाय को प्रभावित करने वाला मामला था और उनके द्वारा इसका विरोध किया गया था। मैंने सोचा कि यह कोई बेहतर उपाय नहीं है कि ऐसे व्यक्तियों के बहुमत से बिल पारित करा लिया जाए, जो इससे प्रभावित नहीं हैं। मैं कभी भी हिंदू कोड बिल का पक्षघर नही था, अपितु कुछ समय के लिए मैं अपने बिल के पक्ष में था। मैं समझता हूँ कि इससे मेरे माननीय मित्र श्री ताजमुल हुसेन संतुष्ट हो सकेंगे। मैंने हिंदू सदस्यों से पूछा कि वे मुझे बताएं कि क्या किया जाए और चूंकि वे मेरे बिल के विरुद्ध थे, अतः बिल को छोड़ दिया गया। मुझे इस बात की स्वीकृति से कोई डर नहीं है कि हर किसी ने और यहां तक कि राउ समिति ने भी यह सोचा कि मेरे बिल को दरकिनार करने वाला एक बिल लाया जाए, ताकि कृषि भूमि के लिए प्रत्येक स्थानीय विधानसभा में 1937 के अधिनियम का विस्तार किया जा सके। मैं भी इसी नीति पर चल पड़ा, किंतु तभी मैंने देखा कि बड़ी संख्या में हिंदुओं की राय मेरे बिल के विरुद्ध थी। किसी भी प्रान्त ने 1937 के अधिनियम को कृषि के लिए लागू नहीं किया। उसके बाद से, श्रीमान्, बंगाल में बड़ी संख्या में बैठक हुई है और राउ समिति के बिल की एक स्वर में निन्दा हुई है।