अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 443

428 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मछली और सब्जियां एक साथ पकाते हैं और एक शाकाहारी से एक संशोधन के माध्यम से उन्हें अलग-अलग करने को कहते हैं, तो यह कार्य घोड़े के सामने गाड़ी रखने जैसा होगा। बिल में विशिष्ट और अलग श्रेणियों के कानूनों को पूर्णतः मिश्रित कर दिया गया है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः नहीं, नहीं। इसके अलग-अलग अध्याय हैं।

माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य अपना निजी दृष्टिकोण प्रकट कर रहे हैं और अन्य माननीय सदस्यों को भी अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने का अवसर मिलेगा। क्या बाधा उत्पन्न करना उचित कार्य है, इससे केवल उनके भाषण की अवधि बढ़ जाएगी।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः किसी एक भाग के अनुच्छेदों को वहां से उठाकर अन्य भाग में रख दिया गया है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः श्रीमान्, एक व्यवस्थागत आपत्ति है। इनका बयान है कि विभिन्न अध्यायों को आपस में मिलाया गया है, जिसमें सुधार की गुंजाइश है। तो क्या मुझे इस बात में सुधार करने का कोई अधिकार नहीं है?

माननीय अध्यक्षः अपने तरीके से वे पुनः सुधार के पात्र होंगे। यहां कोई बाधा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। मैं सोचता हूँ कि हम अनावश्यक रूप से व्यग्र हो रहे हैं। बिल के पक्ष में अथवा उसके विरोध में हमारे जो भी विचार हों, हमें अपने सामने वाले को ध्यान से सुनना चाहिए और उसके तथ्यों को समझने का प्रयास करना चाहिए। मैं प्रत्येक को पूर्ण अवसर प्रदान करूँगा। अतः अब कोई बाधा उत्पन्न न हो।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः इस दिशानिर्देश के लिए मैं बहुत आभारी हूँ। तथ्य यह है कि प्रत्येक भाग में परिभाषाएं और अन्य धाराएं बिल्कुल अलग-अलग थीं। किसी के लिए भी यह बहुत सरल है वह सदन में श्री जोगेन्द्रनाथ मंडल द्वारा प्रस्तुत मूल बिल और संशोधित बिल के बीच तुलना करके बड़े सब्र के साथ उनके अंदर को देख सकता है।

एक माननीय सदस्यः जोगेन्द्रनाथ मंडल कौन थे?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः वह पूर्व कानून मंत्री थे। यदि कोई उनके द्वारा प्रस्तुत बिल और वर्तमान बिल की तुलना करे तो वह देखना सरला होगा कि विभिन्न भाग अन्य भागों के साथ जोड़ दिए गए हैं। यद्यपि यह कार्य पूर्णतया सदाशयी दिखाई देता है, परन्तु वह विषयों पर अलग-अलग विचारों के उद्देश पर पूरी तरह आधारित नहीं था। वास्तव में, प्रवर समिति ने विधि मंत्रालय द्वारा फिर से तैयार किए गए बिल को प्रस्तुत किया था। जिस पर मेरा मानना है कि यह प्रवर समिति पूरी तरह भ्रम में रखने जैसा था। यह वही दस्तावेज था, जो 17 जुलाई, 1948 को मुद्रित हुआ था। इसे प्रवर समिति के उपयोगार्थ हाथों-हाथ तैयार किया गया था और प्रवर-समिति कभी बैठती उसके पहले इसे विभागीय बिल को उसे प्रस्तुत किया था। मैं पहले ही इसके एक बिंदु पर काम कर चुका हूँ, कि