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‘‘जब तक इसके विरुद्ध सिद्ध न हो जाए, तब तक यह माना जाएगा कि यह सम्पूर्ण संहिता उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होगी जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी धर्म का नहीं है।’’
अतः मूल बिल में एक परिकल्पना पर आधारित नियम है। किन्तु विभागीय बिल में, यह एक परिकल्पना का नियम न होकर, कानून का एक सकारात्मक नियम है। मूल बिल में यह परिकल्पना की गई थी, कि यदि एक व्यक्ति जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी नहीं है, वह ‘अनुमानतः’ एक हिंदू ही होगा। वह कानून एक नियम नहीं हो सकेगा, अपितु वह एक परिकल्पना आधारित नियम होगा। लेकिन विभागीय बिल में वह बदलकर इस प्रकार प्रस्तुत किया गयाः
‘‘यह संहिता उन अन्य व्यक्तियों पर भी लागू होगी जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी धर्म के नहीं हैं।’’
इन दोनों के बीच अंतर यह है कि मूल बिल के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी धर्म का नहीं है उसे हिंदू मान लिया जाएगा और उसे इस अधिनियम के द्वारा शासित माना जाएगा। पर विभागीय बिल में यह कहा गया किः
‘‘संहिता उन अन्य व्यक्तियों पर भी लागू होगी, जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी नहीं है।’’
श्रीमान्, मेरा कहना यह है कि यह एक बड़े बदलाव का संकेत है। मूल बिल में जबकि यह एक अनुमान का नियम था, पर अब यह एक निश्चात्मक नियम है, न कि अनुमान का नियम, न कि हिंदु कानून उस किसी भी व्यक्ति पर लागू होता है, जो मुस्लिम, ईसाई, पारसी अथवा यहूदी नहीं है।
प्रावधान में यह कहा गया हैः-
‘‘यदि यह सिद्ध हो जाता है कि हिंदू कानून प्रत्येक पर लागू नहीं होता, तो हिंदू कानून लागू नहीं होगा।’’
मैं समझता हूँ कि यह तथ्यों के उल्लेख का सबसे असंतोषजनक तरीका है। अंतिम बिल इसे अन्यों पर भी लागू कर देता है और उक्त प्रावधान के साथ-साथ इसने कानून में भी परिवर्तन कर दिया है।
श्रीमान्, मैं कहता हूँ कि इससे एक गंभीर परिवर्तन हो गया है। मैं कानून की नीति के बारे में चिंतित नहीं हूँ। किंतु, मैं विभागीय बिल में हुए बदलावों के बारे में चिंतित हूँ, जिनके बारे में प्रवर समिति अनभिज्ञ है।
तो, श्रीमान् अब मैं बिल के दूसरे भाग पर आता हूँ। विभागीय बिल में ....