अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 456

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श्रीमान्, क्या मैं आपसे अनुरोध कर सकता हूँ कि आप इस पर विचार करें और देखें कि क्या मैं तथ्य से असंबद्ध अथवा गलत हूँ? जब तक कि परिवर्तन महत्वपूर्ण नहीं होते संभवतः, वे स्पष्ट रूप से हिंदू कानून के मूल-पाठों को और शीर्ष न्यायालयों द्वारा नियमों की व्याख्या की अनदेखी करते हैं। मूल विधेयक में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं थी। परिवर्तन विभागीय समिति ने किये थे क्या यह, किसी भी तरह से, एक महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं था। दास महाशय विधिक मामले नहीं सुन सकते। वह वित्तीय मामलों के जानकार हैं, किन्तु विधिक मामलों में वह तेजी से वापस अपने दूसरे बचपन की ओर बढ़े जा रहे हैं।

श्री. बी. दासः हम यहां कानून बनाने के लिए आते हैं। यहां हम वकीलों की अथवा उच्च न्यायालय के न्यायधाशों की व्याख्याएं सुनने को नहीं आते। (हस्तक्षेप)।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, यहाँ महत्वपूर्ण परिवर्तनों पर काफी कुछ आधारित है। क्या इनकी प्रस्तुत विभागीय समिति द्वारा नहीं की गई है? यह पूरा मामला इसी मुद्दे पर आधारित है। यदि इसकी प्रस्तुति विभागीय समिति द्वारा की गई थी और यदि यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था, तब प्रवर समिति को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई थी। यह बार-बार स्पष्ट किया गया है कि प्रवर समिति ने विभागीय विधेयक पर विचार-विमर्श किया था न कि मूल विधेयक पर। यदि यह आक्षेप करना है, तो मुझे खेद है कि मुझे बड़ी निष्ठापूर्वक और बिना डरे, पर आदरपूर्वक अपना कर्तव्य निबहाना होगा। मैं कहता हूँ कि प्रवर समिति को यह विश्वास दिलाने के लिए पूरी तरह पुसलाया गया था कि विभागीय विधेयक, मूल विधेयक का एक महत्वपूर्ण प्रतिकृति ही था, और यहां तक कि कानून मंत्री से भी यह विश्वास करने को कहा गया कि इसमें कोई परिवर्तन नहीं था। यह आक्षेप नहीं है, यह एक तथ्य है। तब, परितर्वन किसने किए? यदि यह कार्य कानून मंत्री ने किया था, तो उन्हें इसकी जानकारी होनी चाहिए थी। क्या वह कोई और था? तब, मेरे लिए यह कहना उचित न होगा कि किसी अन्य द्वारा परिवर्तन किए हैं। मैं बस यह कहता हूँ कि उसने ये परिवर्तन भूलवश अथवा सदाशयी तौर पर किए। लेकिन क्या मेरे लिए यह सुझाव देना उचित होगा कि ये परिवत्रन कपटपूर्वक किए गए थे? मैं इस तरह का कोई सुझाव नहीं देता। मैं केवल इतना करूंगा कि मैं यह अनुमान लगा सकता हूँ कि ये कार्य सदाशयी तरीके से किए गए थे-सुधार के लिए इन पर थोड़ी-सी कलम चलाई गई थी। ‘मात्र प्रथागत कानून को ही क्यों समाप्त किया जाए? आइए, हम प्रिवी काउंसिल के सभी नियमों को भी समाप्त क्यों न कर दें?’

श्रीमान्, मेरी आलोचना उचित है। यदि मैंने कोई शब्द गलत तरीके से इस्तेमाल किया है, तो मैं उसे वापस लेता हूँ। किन्तु आलोचना तो करूँगा ही!

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः अब हम अन्य तर्कों को सुनें।