अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 459

444 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री ए. थानु पिल्लेय (ट्रावरकोर राज्य)ः क्या मैं माननीय सदस्य से यह जान सकता हूँ कि क्या यदि कानून में कोई शब्द जरूरी नहीं है, तो भी उसे परिभाषित किया जाना चाहिए?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं सोचता हूँ कि माननीय सदस्य इतनी सावधानीपूर्वक इस कार्यवाही में भाग नहीं ले रहे हैं, जितना कि उन्हें होना चाहिए। वास्तव में, क्या किसी शब्द की परिभाषा अपेक्षित है अथवा अपेक्षित नहीं है, प्रश्न यह नहीं है।

विधेयक में एक परिभाषा थी और उसे किसी के द्वारा, किसी प्राधिकार के बिना ही हटा दिया गया। विभागीय समिति ने इसे हटाया, और प्रवर समिति, जो इसे हटाए जाने के लिए अकेले सक्षम थी, का ध्यान इस ओर आकर्षित तक नहीं किया गया।

श्रीमती जी. दुर्गाबाईः प्रवर समिति इसके लिए पूरी जिम्मेदारी लेती है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः इस पर प्रवर समिति द्वारा विचार-विमर्श ही नहीं किया गया।

श्री एम. तिरुमला राव (मद्रासः सामान्य)ः क्या आप आश्वस्त हैं कि उसे कम्पोजीटर ने नहीं हटाया था?

माननीय अध्यक्षः जो व्यक्ति बाधा पहुंचाएंगे, उन्हें हस्तक्षेप वाला माना जाएगा। कारण यदि किसी को रोका जाता है, तो वह अधिक समय लेगा।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः मैं यह कहते हुए इस बहस को छोटा करना चाहता हूँ कि वास्तव में प्रवर समिति का ध्यान इन सब बातों की ओर आकर्षित किया गया था। माननीय सदस्य इस बिंदु पर अनावश्यक राग अलाप रहे हैं, कि प्रवर समिति का ध्यान आकर्षित नहीं किया गया था। किन्तु प्रवर समिति का एक सदस्य होने के नाते, मैं यह कह सकता हूँ कि इन सभी बिंदुओं पर पूरी तरह विचार-विमर्श किया गया था, मामले के सभी पहलुओं पर प्रवर समिति द्वारा विचार-विमर्श किया गया था। अतः माननीय सदस्य को बार-बार इस मामले को उठाने की आवश्यकता नहीं है।

माननीय अध्यक्षः मैं यह कहूँगा कि यदि इस प्रश्न पर पूरी तरह विचार कर लिया गया है, तब भी माननीय सदस्य को पूर्ण अधिकार है कि वह अपने विचार रखें। माननीय सदस्य यह देखेंगे कि वह बिल के पुनर्विचार के लिए मामला प्रवर समिति को भेजना चाहते हैं, और इसी के लिए वह अपने तर्क दे रहे हैं। प्रवर समिति ने, हो सकता है, पूर्ण, पर्याप्त, समुचित, उचित ध्यान दिया हो, किन्तु उनकी राय में, यह अपर्याप्त है। अतः वह जोर दे रहे हैं कि दिया गया ध्यान अपर्याप्त था और विधेयक को प्रवर समिति के पास पुनर्विचार के लिए पुनः भेजा जाना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर वह अपनी बात कह रहे हैं_ और यदि वह इसी तर्क विशेष पर चल रहे हैं, तो उन्हें उसी