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पर चलते रहना चाहिए। जहाँ तक इस तथ्य की पर्याप्तता का प्रश्न है कि प्रवर समिति के सदस्य किसी तथ्य के पूर्ण निर्णायक नहीं हो सकते कि क्या विधेयक पर समुचित अथवा पर्याप्त ध्यान दिया गया था या नहीं, इसी प्रकार, माननीय सदस्य का निर्णय भी अंतिम नहीं है। किन्तु वह अपनी राय रख रहे हैं। आइए, हम इसी आधार पर आगे बढ़ें। अन्यथा इस बातचीत का कोई अत नहीं होगा।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः मैं केवल प्रश्न के बारे में तथ्यात्मक उल्लेख कर रहा था।
माननीय अध्यक्षः यह अभिमत संबंधी प्रश्न है। माननीय सदस्य जिसे एक तथ्यात्मक प्रश्न समझते हैं, वह वास्तव में सम्मतियों का प्रश्न है। ध्यान दिए जाने में पर्याप्तता थी या नहीं, यह सम्मतियों का एक प्रश्न नही हैं, बल्कि मात्र तथ्यात्मक प्रश्न है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः यहाँ प्रश्न उपयुक्त विचार-विमर्श का है।
(इसी समय अध्यक्ष महोदय अपनी कुर्सी से उठकर चले गए, इसके बाद उपाध्यक्ष महोदय श्री एम. अनंतसयनम आयंगर ने उनका स्थान ग्रहण किया।)
श्री कृष्णास्वामी भारतीः मैं केवल अपने बारे में बात कर रहा था।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः आप चीजों को समझ नहीं सकते।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः वास्तव में यह एक व्यक्ति का मामला नहीं है। यह मामला पूरी प्रवर समिति का है न कि एक व्यक्ति का। यदि एक व्यक्ति ने अनुशरण किया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि दूसरों ने भी किया है।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः हाँ,
श्री नजीरुद्दीन अहमदः बिल्कुल।
यदि प्रवर समिति में एक व्यक्ति समझता है कोई बदलाव नहीं किया गया है तो इससे बिल को प्रवर समिति में पुनर्विचार किए जाने हेतु प्रर्याप्त आधार नहीं बनता। और फिर, उनमें से कितनों ने ध्यान दिया? मेरे मित्र को आश्चर्य होगा कि वहां बहुत सारे बदलाव थे। मैं बतला सकता हूँ बहुत, बहुत बदलाव हुए हैं। उदहारण के लिएख्...,
श्रीमति दुर्गाबाईः इसी बीच सूचना के प्रश्न पर क्या मैं पूछ सकती हूँ कि बदलाव जो प्रवर समिति ने किए हैं, सदन के लिए बाह्यकारी हैं? सदन क्या उन्हें स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकती?
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं आदरपूर्वक कहता हूँ कि यह असंगत है पूछना कि प्रवर समिति के द्वारा किए गए बदलावों को सदन को स्वीकार करना चाहिए अथवा