446 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अस्वीकार करना चाहिए। प्रवर समिति कोई भी बदलाव कर सकती है और सदन भी उसके आगे बदलाव कर सकती है। सदन बदलाव कर सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं है। किन्तु प्रश्न यह है कि प्रवर समिति ने किसी कारण-वश कर सकी अथवा नहीं कर सकी अथवा असफल हुई अपने कर्तव्य को निभाहने में पूरी तौर पर। यदि ऐसा है तो प्रश्न की तह तक जाने का अधिकार सदन पर है और यही कारण हे कि मैंने प्रवर समिति की ओर से उससे बड़ी सदन को निवेदन किया। बेशक, उससे भी बड़ा सदन है समस्त भारत का प्रतिनिधि। अब मैं मूल धारा पर आता हूँ। (व्यवधान)
माननीय सदस्य इस बात का विश्वास नहीं दिला सकते कि प्रवर समिति ने प्रत्येक वस्तु पर विचार किया है। यदि वे सही हैं तो मैं भी सही हूँ कई कारणों से पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, मुझे कल से ही प्रायः लगातार से अपनी बात कहने से रोका जा रहा है, और आज भी पुनः अनेक बार बाधा उत्पन्न की गई है।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः मैं लगातार आपका समर्थन कर रहा हूँ।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरे मित्र श्री भारती यहां मौजूद हैं। क्या वह सदन को बतलाने के लिए प्रवर समिति में क्या कुछ हुआ है? यदि ऐसा है तो मेरे पास भी इसके विरुद्ध प्रवर समिति के ही सदस्यों के समान शक्ति का प्राधिकार है। एक सदस्य के बयान की दूसरे से तुलना करना बहुत गलत होगा और यह इस बात पर परदा डालने जैसे होगा कि प्रवर समिति में क्या कुछ हुआ।
मुझे लगता है कि यहाँ कुछ सदस्यों की बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई है।
श्री तजामुल हुसेनः मैं इस बयान पर कड़ा विरोध प्रकट करता हूँ कि सदस्यों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। मैं इस व्यवस्थागत आपत्ति को गंभीरता के साथ उठा रहा हूँ। उन्हें बिना शर्त अपने शब्द वापस लेने चाहिए।
माननीय अध्यक्षः मैं सोचता हूँ कि माननीय सदस्य का इस तरह कहना अनावश्यक था।
श्री तजामुल हुसैनः वह अपना कथन वापस लें। क्या वह ऐसा बयान देते हुए होश में हैं? वह कुल मिलाकर माननीय सदस्य के विरुद्ध हिंसक आक्षेप कर रहे हैं?
माननीय अध्यक्षः मैं नहीं समझता कि माननीय सदस्य द्वारा यह कहना कि सदस्यों की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, उचित टिप्पणी थी। इससे सदन की गरिमा भंग होती है। इस समय मैं यह कह सकता हूँ, कि मैं देख रहा हूँ एक-दो सदस्य ऐसी भाषा का प्रयोग