448 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैंने जैसा कहा है कि पुत्र की परिभाषा दी गई है, इस संबंध में भाग II, उप-धारा (3) की धारा 2 में इच्छा-पत्रहीन उत्तराधिकार में भी स्पष्टीकरण दिया गया है। चार स्पष्टीकरण विलुप्त कर दिए गए हैं। ये महत्वपूर्ण परिवर्तन हैं। मैं केवल किए गए परिवर्तनों की प्रकृति की ओर ध्यानाकर्षित करने का प्रयास कर रहा हूँ। मेरे अनुसार ये भूलें बहुत गंभीर प्रकृति की हैं ये भूलें प्रारुप तैयार किये जाने की प्रकृति नहीं हैं। मैं विधेयक में सुधार के लिए प्रवर समिति के अधिकार पर प्रश्न नहीं कर रहा हूँ, अथवा इन भूलों को करने पर प्रश्न नहीं उठा रहा हूँ। ये परिवर्तन, हालांकि, प्रवर समिति द्वारा नहीं किए गए, बल्कि प्रारूप समिति द्वारा किए गए थे पर इन भूलों की ओर प्रवर समिति का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित नहीं किया गया था।
तत्पश्चात् मैं विधेयक के एक अन्य महत्वपूर्ण भाग पर आकर यह दिखाना चाहता हूँ कि प्रारूप समिति द्वारा बहुत गंभीर परिवर्तन किए गए थे। भाग II, में मूल, विधेयक की धारा 4 में, वारिसों की सूची दी गई है। इसमें उल्लेख है कि उत्तराधिकार में प्राप्त किसी पुरुष की इच्छा पत्रहीन संपत्ति इस भाग में निर्धारित नियमानुसार कानूनन उन्हें सौंप दी जाएगीः (क) सूची में उल्लिखित उत्तराधिकारी को, यदि कोई हो, जैसा अनुच्छेद 5 में उल्लिखित है_ (ख) यदि सूची में कोई अगला उत्तराधिकारी न हो, तो उसके किसी सगौत्र को यदि कोई हो_ (ग) यदि कोई सगौत्र न हो, तो उसके सजातीय बन्धु को, यदि कोई हो_ और (घ) यदि कोई सजातीय बन्धु न हो, तो अनुच्छेद 10 में उल्लिखित किसी वारिस को, यदि कोई हो।
माननीय अध्यक्षः मैं नहीं जानता कि माननीय सदस्य के पास हिंदू संहिता की तुलनात्मक तालिकाओं की प्रतिलिपि है या नहीं है जो कि सभी सदस्यों को परिचालित की गई थी। राउ समिति द्वारा मूल हिंदू संहिता का जो मसौदा तैयार किया गया था, उसे विधि मंत्रालय द्वारा संशोधित किया गया है और उसमें किए गए परिवर्तन भी दर्शाए गए हैं। अतः मैं सुझाव देना चाहूंगा कि माननीय सदस्य इस मुद्दे पर मेहनत न करें। मैं सोचता हूँ कि उन्होंने इस मुद्दे पर पर्याप्त समय ले लिया है। व्यक्तिगत तौर पर मैं सोचता हूँ कि यह मुद्दा काफी हद तक स्पष्ट है और वास्तव में स्पष्टीकरणों के द्वारा उसे कई गुना बढ़ाया जा सकता है। मैं सोचता हूँ कि उन्होंने पहले मुद्दे पर ही पर्याप्त समय बिता दिया हैं व्यक्तिगत तौर पर मैं सोचता हूँ कि यह मुद्दा पर्याप्त स्पष्ट है और वास्तव में स्पष्टीकरणों को और भी कई गुना बढ़ाया जा सकता है। यदि यह मुद्दा इधर या उधर का है, तो यह सदन उस पर विचार कर लेगा। कुछ ऐसे मुद्दे होते हैं जो बनाए जाते समय संख में होते हैं। मैं इससे सहमत हूँ कि उन्हें भी स्पष्ट किया जा सकता है, किन्तु तालिका में किए गए परिवर्तन ही पर्याप्त हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, सूची न तो पूर्ण है, न ही सही और वह परिवर्तनों को भी उजागर नहीं कर पाती है। वास्तव में, मूल विधेयक की मूल शर्तों और किए गए