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परिवर्तनों के विरुद्ध की गई टिप्पणियां अभी अपर्याप्त है। अब मैं एक बहुत महत्वपूर्ण परिवर्तन पर आता हूँ, जिसका नाम है विरासतं इसमें इस कदर परिवत्रन किया गया है कि इसे नए विधेयक के साथ अथवा विभागीय प्रारूप के साथ देखना असंभव हो जाता है और न ही यह किसी भी प्रकार से मूल बिल का स्थान ले पाया है। अतः मैं कह सकता हूँ कि विरासत के संबंध में बड़ी संख्या में परितर्वन किए गए है।
सर्वप्रथम मैं सूचीबद्ध किए गए वारिसों के संबंध में विधेयक के भाग II (क) की धारा 4 में किए गए उल्लेख पर यह प्रदर्शित करने की स्थिति में हूँ कि वारिसों की सूची में गंभीर परिवर्तन किए गए हैं। मूल बिल में वह एक समान थी और विभागीय समिति के प्रारूप में वह बिल्कुल भिन्न है। मूल व्यवस्था पूरी तरह गड्ड-मड्ड हो गई है और यह कहा गया है कि यदि कोई लिखित रूप से वारिस न हो तो संपत्ति किसी एक सपिण्ड व्यक्ति को चली जाती है। सपिण्ड व्यक्ति की परिभाषा सर्वविदित है। वह परिभाषा मूल विधेयक में थी, किंतु विभागीय समिति द्वारा संशोधित विधेयक में ‘सपिण्ड’ शब्द को अब काफी हद तक सीमित कर दिया गया है। अतः लिखित उत्तराधिकारी के न होने की स्थिति में सपिण्ड व्यक्ति, जहां तक कि दूरस्थ भी हिंदू कानून, मुस्लिम कानून और अन्य सभी कानून जो मूल विधेयक के अनुरूप हैं, के अनुसार उत्तराधिकारी के पात्र होंगे। किन्तु विभागीय समिति द्वारा तैयार नए संशोधित प्रारुप में ‘सपिण्ड’ शब्द को एक निश्चित सीमा तक गंभीर रूप से संशोधित कर दिया गया है। ऐसे सगोत्रीय जो उन सीमाओं से परे थे, पुराने विधेयक के तहत उत्तराधिकार के पात्र हो गए होते, किन्तु विभागीय विधेयक के तहत वे इस अधिकार से बाहर हो जाएंगे। इसी प्रकार, नजदीकी रिश्तेदारों (कोग्नेट) को विभागीय विधेयक में भी प्रतिबंधित किया गया है और यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है क्योंकि यह दूरस्थ एकवंशीय और दूरस्थ नजदीकी रिश्तेदारों को पूर्णतया वंचित कर देता है। तत्पश्चात्, श्रीमान्, भाग 4, धारा (घ) में, तथा अन्य शब्द भी पूरी तरह से हटा दिए गए। मूल विधेयक के भाग II, की धारा 4 में उत्तराधिकार की पद्धति प्रत्येक चरण में परिवर्तित कर दी गई है और उसमें अत्यंत गंभीर परिवर्तन किए गए हैं तथा सूचीबद्ध किए गए उत्तराधिकारियों में भी परिवर्तन किया जा चुका है। एकवंश वाले व्यक्तियों को समिति कर दिया गया है_ नजदीकी रिश्तेदारों को सीमित कर दिया गया है और अन्य धाराओं को पूरी तरह से हटा दिया गया हैं मैं भली-भांति समझता हूँ कि प्रवर समिति द्वारा स्पष्ट तौर पर पूरी तरह विचार-विमर्श करके ये परिवर्तन किए जा सकते थे, किंतु ये परिवर्तन प्रवर समिति के नहीं, बल्कि विभागीय समिति द्वारा किए गए हैं और सदस्यों ने मुझसे पूछा है ‘‘हमें बताएं, क्या परिवर्तन किए गए हैं?’’
माननीय अध्यक्षः क्या मैं माननीय सदस्य से जान सकता हूँ कि यदि प्रवर समिति के सभी सदस्य खड़े होकर स्वयं ही संबोधित करने लगें, तो क्या माननीय सदस्य पूरी तरह से संतुष्ट हो जाएंगे कि प्रवर समिति द्वारा क्या कार्य किया गया है।