अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 466

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कि सभी परिवर्तन प्रवर समिति द्वारा किए गए थे? और प्रवर समिति के बारे में यह भी कहा गया है ‘‘हमने अपना ध्यान विभागीय विधेयक तक समिति रखा है’’। इससे यह प्रतीत होता है कि उनका ध्यान इस ओर आकर्षित ही नहीं किया गया था। यह एक बहुत सीधा-सा निष्कर्ष है।

माननीय डॉ.बी.आर. अम्बेडकरः आप इसे अपने तरीके से दीजिए।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि माननीय कानून मंत्री ने स्वयं को ऐसी असुविधाजनक परिस्थिति में घिरा पा रहे हैं, और किसी भी तरह से या अन्यथा, अपनी भूल मान भी रहे हैं, तो उसे तर्कसंगत नहीं मान रहे हैं वास्तव में, किए गए परिवर्तन महत्वपूर्ण प्रकृति के थे। कल मुझसे माननीय कानून मंत्री ने स्वयं पूछा थाः ‘‘कृपया हमें बताएं कि प्रारुप समिति द्वारा क्या परितर्वन किए गए है,’’ और अब वे कह रहे है ‘‘मैं सब कुछ जानता हूँ।’’ निःसंदेह उन्होंने बाद में उनका अध्ययन कर लिया होगा, किन्तु ये सभी परिवर्तन गंभीर प्रकृति के हैं। उनकी शुरूआत प्रवर समिति द्वारा नहीं की गई थी, बल्कि विभागीय समिति द्वारा की गई थी और प्रश्न यह है कि वास्तव में प्रवर समिति उन्हें कहाँ तक समझ पाई। कम से कम डॉ. बक्शी टेक चन्द ने अपनी असहमति की टिप्पणी में कहा है ‘‘हमने अपना ध्यान विभागीय समिति विधेयक तक समिति रखा और मूल विधेयक पर ध्यान नहीं दिया’’, क्योंकि उन्हें आश्वस्त कर दिया गया था कि विभागीय विधेयक में उन्होंने कोई भी महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए थे। अतः इसे ध्यान में रखते हुए, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करना चाहिए। वास्तव में, यदि यह एक गंभीर अनियमितता नहीं है, और सदन के ध्यान में लाए जाने का मामला नहीं है, तो मैं नहीं जानता, यह क्या है? जब विभाग द्वारा निर्णय लेने में भूल की गई है, तो मैं समझता हूँ कि इसे स्वीकार लेना बेहतर और उपयुक्त होगा, बजाय इसके यह कहना किः ‘‘मैं यह सब कुछ जानता हूँ किन्तु वहाँ कोई परिवर्तन नहीं किए गए। प्रत्येक परिवर्तन प्रवर समिति द्वारा किया गया।’’ और जब मैं कहता हूँ कि प्रवर समिति ने कोई परिवर्तन नहीं किए और सभी परिवर्तन विभागीय समिति द्वारा किए गए तो यह कहा गया किः ‘‘मैं इस बारे मे भी जानता हूँ’’ इसलिए हम जानना चाहते हैं कि इसमें विभाग की क्या स्थिति है? यदि विभागीय द्वारा कोई परिवर्तन किया गयाख्...,

श्री बी. दासः यह कोई कानूनी अदालत नहीं है, जहाँ हम मदवार सुनवाई करें। माननीय सदस्य को अपना भाषण समाप्त करके बैठ जाना चाहिए।

माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य, श्री बी.दास ने सदन में अध्यक्ष की उपस्थिति में यह बयान दिया था। कुछ हद तक यह एक कानूनी अदालत ही है पर उस अर्थ में कानूनी अदालत नहीं है कि वह माननीय सदस्यों पर यह प्रभाव डालना चाहते हों जैसे कि वह एक कानूनी अदालत में बहस कर रहे हैं फिर भी, हम उन्हें बाधा पहुंचाना नहीं चाहते। जहाँ तक संभव हो इस प्रकार के विवाद से बचना चाहिए।