अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 472

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है और इसकी कसौटी क्या है? क्या उत्तराधिकारी की सूचियों को अस्त-व्यस्त करना एक महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं है? मैं कहता हूँ, है। यदि ऐसा है कि मैं बहुत बहस कर रहा हूँ, इस तरह की जैसे यह कोई कानूनी अदालत हो-यदि कोई माननीय सदस्य ऐसा सोचता हो-तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन परिवर्तनों की गंभीरता को पूरा महत्व नहीं दिया जा रहा है।

श्री तजामुल हुसैनः सिवाए आपके।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसे केवल एक व्यक्ति द्वारा महत्व दिया जाए। निःसंदेह यह एक सर्वाधिक धन पाने वाला विभाग है और यहाँ एक सर्वाधिक सुयोग्य कानून मंत्री भी हैं जो थोड़े से अंतरों को भी समझ पाने में सक्षम हैं। किंतु मुझे खेद है कि मुझे इन समस्त समस्याओं से गुजरना पड़ा और यह सब पता लगाने और इनका स्पष्टीकरण देने में मुझे अपना समय और धन दोनों खर्च करने पड़े। यह एक सरल मुद्दा नहीं था और इस बात से यह समस्या और बढ़ गई कि जिस विभाग ने सभी परिवर्तन किए, वह मुझे ड्राफट विधेयक की प्रतिलिपि तक उपलब्ध नहीं करवा सका। बहुत खोज-बीन करने के बाद ही मैं उसकी एक प्रति प्राप्त कर सका। अतः यह खोज लम्बी हो गई और विचार-विमर्श भी लम्बा हो गया है तथा मेरे लिए यह मामला बहुत कठिन हो गया है। मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि कोई अन्य सदस्य इसके महत्व को नहीं समझ सकता, किन्तु इस पर विचार करने के लिए कुछ के पास ही समय है-अथवा कुछ को ही इसमें अभिरुचि है। और वे ऐसा करें भी क्यों? लेकिन क्या यह प्रत्येक सदस्यों का कर्तव्य और स्पष्ट विशेषाधिकार नहीं है- और मैं सदस्यों के पक्ष में यह बात कह रहा हूँ-कि वे विधि मंत्रालय पर विश्वास कर लें या प्रवर समिति की रिपोर्ट में दी गई इस गारंटी पर विश्वास कर लें कि कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए गए हैं। मैं सोचता हूँ कि उन्हें पूर्ण औचित्य मिल गया है, एक माननीय सदस्य यदि यह कहता है कि मेरे अलावा इस बारे में और कोई नहीं जानता तो मैं उसे दोष नहीं दे सकता। ये दोष विभाग का है। क्या अब इन परिवर्तनों का कोई अंत है? शायद किसी भी तरह नहीं।

अब श्रेणी V -क पर आइए। इसका प्रवेश राउ समिति द्वारा अपने पूर्व विधेयक में संशोधन के द्वारा किया गया था। उसकी टिप्पणी है कि यह श्रेणी V -क, श्रेणी V के बाद शुरू की जाए। लेकिन अब श्रेणी V -क पूर्णतया विलुप्त कर दी गई है। मैं विनम्रता से यह सुझाव देना चाहता हूँ कि यह विलोपन अनजाने में किया गया या जानबूझ कर, किंतु इससे विधेयक की निष्ठा को पूर्णतया क्षति पहुंची है।

तत्पश्चात् श्रीमान्, हम श्रेणी VI पर आते हैं।