अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 476

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श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरे पास कई अन्य गंभीर परिवर्तनों की जानकारी भी है। अतः मैं यह जानना चाहूंगा कि माननीय कानून मंत्री कब तक इस बात पर जोर देते रहेंगे कि कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुए हैं।

श्री खुर्शीद लाल (उपमंत्री-संचार)ः तब तक, जब तक आप अपनी बात समाप्त नहीं करते।

माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य एक वकील के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर यह आशा कर सकते हैं कि जिसने इस विधेयक का प्रस्ताव रखा है, वह यह बात लेगा कि उसने जो भी किया वह गलत था?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, मैं आपकी इस भारी-भरकम टिप्पणी का आदर करता हूँ। किन्तु यह कोई कानूनी आदलत नहीं है, जहां हम किसी का पक्ष लेते हैं। यह एक विधान परिषद है जहाँ हम किसी का पक्ष नहीं लेते। हम ईमानदारी से अपनी राय जाहिर कर सकते हैं, किन्तु हम यहाँ फीस लेने के बदले में किसी का पक्ष नहीं लेते। हम एक पक्ष अथवा दूसरे पक्ष की ओर जाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। मैं कहता हूँ कि विधायिका में, एक कानून मंत्री यदि कोई गलती करे तो उसे विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व निभाते हुए इस स्वीकारोक्ति को अपने कर्तव्य का अंग समझना चाहिए। अतः मुझे एक क्षीण-सी आशा भी है कि इन त्रुटियों एवं परिवर्तनों का अम्बार, माननीय कानून मंत्री को कुछ हद तक इस स्वीकारोक्ति के लिए प्रेरित करेगा कि उन्होंने महत्वपूर्ण परिवर्तन किए थे और तब मेरा अपने तर्क को आगे बढ़ाना अनावश्यक हो जाएगा। परन्तु इस तथ्य के आलोक में कि माननीय कानून मंत्री एक योद्धा की भांति बंदूक लेकर

खड़े हैंµवह अपने जीवनकाल में एक योद्धा की भांति रहे हैं और वह अपने धैर्य और नैतिक गुणों के लिए प्रसिद्ध भी रहे हैंµऔर मैदान में डटे हुए हैं, मैं उन्हें एक क्षीण उम्मीद के साथ अधिकारिक परिवर्तनों के बारे में बताना चाहता हूँ, ताकि अंततः वह इन्हें मान लेने के लिए प्रेरित हो जाएँ।

श्री खुर्शीद लालः मैं बाधा नहीं पहुंचाना चाहता, किन्तु क्या उनका आशय यही है कि वह इसी तरीके से अपनी बातें करते रहेंगे जब तक कि वह कानून मंत्री से यह स्वीकार नहीं करवा लेते कि उन्होंने गलती की थी?

माननीय अध्यक्षः अकेले कानून मंत्री ही क्यों? संभवतः अन्य सदस्य भी उनसे सहमत होंगे क्योंकि वे पूरे सदन को अपने साथ लेकर चलते हैं।

श्री बी. दासः श्रीमान् आप ऐसे कैसे कह सकते हैं, हम उनकी आवाज बंद कर सकते हैं।