34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अब मैं उन उपबंधों, पर आता हूं, जिन्हें प्रवर समिति ने तैयार किया है और इस संबंध में सबसे जटिल प्रश्नों पर हमारा दृष्टिकोण क्या होना चाहिए? चाहे वे मामले उत्तराधिकार और भरण-पोषण के लिए ही क्यों न हों, मैं बलपूर्वक इनके बारे में अपनी बात कहूँगा। जैसा कि मैंने पहले भी अपने अवलोकन में कहा था, मैं इस पक्ष में हूँ कि भारतीय महिला को चल और अचल सम्पत्ति में सहभागिता का अधिकार दिया जाए ताकि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकें। परन्तु इसी के साथ मैं इस बात का विरोध करता हूँ कि पिता की सम्पत्ति में बेटी को कोई भाग दिया जाए। मैं यह चाहता हूँ कि जहां तक अविवाहित पुत्री का संबंध है, उसे बेटे के समान पूरा हिस्सा दिया जाना चाहिए, जब तक वह विवाह न करे। परन्तु जैसे ही वह विवाह कर लेती है, तब स्थिति अलग होती है। मुझे लगता है कि हमारे कानून में कोई कमी है परन्तु नया कानून बनाकर उस कमी को पूरा किया जा सकता है कि जैसे एक महिला एक पुरुष के साथ विवाह करती है, तब एक पुरुष और महिला जब वे प्रेम के बंधन में बंध जाते हैं, वे सम्पत्ति में भी एक हो सकते हैं। अन्ततोगत्वा पुरुष और महिला संयुक्त रूप से सम्पत्ति के स्वामी बन जाते हैं और जब पति के पिता का देहान्त हो जाता है, तो दोनों ही समान रूप से पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी बन जाते हैं। इसके अलावा सम्पत्ति का विघटन विशेष प्रकार से भी होता है। मैं जानता हूँ कि शायद समानता की मांग इस प्रकार पूरी नहीं हो पाती। परन्तु इस प्रकार के मामलों में मैं नहीं समझता कि हमारी बहनों को अच्छा परामर्श दिया जाता है प्रत्येक प्रश्न को सुनहरे मापदंड पर तौलते हुए। जिस मापदंड का वे उपयोग करती हैं, सही नहीं है।
क्या मैं यह निवेदन करूं कि जहां तक भरण-पोषण का प्रश्न है, उनके पास ऐसे कानून हैं और ऐसे प्रावधान हैं कि उनके समान अन्यत्र कहीं भी नहीं हैं। श्रीमान, उत्तराधिकार के प्रश्न तथा भरण-पोषण के प्रश्न पर एक साथ विचार किया जाना चाहिए। यदि उन पर एक साथ विचार नहीं किया जाता तो कठिनाई यह होगी। प्रावधानों के कार्यान्वयन का पूर्णतः एहसास नहीं हो पायेगा। इस समय भरण-पोषण के संबंध में पति या पुरुष के कर्तव्य महिलाओं को सौंपे गए कर्तव्यों से नितांत भिन्न हैं। भरण-पोषण के अध्याय के अनुसार, पत्नी का अधिकार है कि उसका पति उसका भरण-पोषण करे, परन्तु क्या पति का अधिकार है कि उसकी पत्नी भरण-पोषण करें? मैं केवल यह बता रहा हूँ कि उसमें अधिकार सामान नहीं हैं। मैं मानता हूँ कि अधिकार सामान नहीं हो सकते हैं, वे अलग-अलग होते हैं। महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग कार्य करने पड़ते हैं और इस आधार पर उन्हें इस प्रकार व्यवस्थित किया जाना चाहिए कि महिलाओं को अपने पूरे अधिकार प्राप्त हो सकें, और न कि पूर्ण समान अधिकार।
श्रीमान् पुनः एक पिता को अपने अल्प वयस्क बेटे के भरण-पोषण का अधिकार होता है, परन्तु जहां तक बेटी का संबंध है, बेटी के अधिकार क्या हैं श्रीमान? यदि बेटी विधवा हो जाती है अथवा उसका विवाह हो जाता है या वह अविवाहित है और बेटी की आयु