हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 50

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कुछ भी क्यों न हो उसके भरण-पोषण का दायित्व रहता है। तथ्य की दृष्टि से जहां तक भरण-पोषण के उपबंधों का संबंध है, मैं डॉ. अम्बेडकर को उनके प्रस्ताव के लिए निश्चय ही बधाई देना चाहता हूँ कि महिलाओं की प्रत्येक स्थिति में सुरक्षा की जानी चाहिए और उसके लिए पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। परन्तु यदि यह एक उपयोगी प्रावधान है, तो यह भी है कि महिलाओं को अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।

माननीय डॉ. अम्बेडकर ने कल हमें बताया था कि प्राचीन काल में एक साथ सम्पत्ति का हस्तांतरण कर दिया जाता था और नारद के अनुसार बेटी को लगभग एक-चौथाई भाग मिला करता था। मैं नहीं जानता कि उन दिनों सामाजिक अस्तित्व का आधार क्या था और परिवार का गठन उसी प्रकार होता था, जैसा कि आज होता है। मैं यह नहीं जानता कि इस बात को हिंदू कानून की किसी पठन-सामग्री में समझाया गया है। यह स्वीकृत स्थिति नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि एक साथ ही उत्तराधिकार की व्यवस्था केवल अविवाहिता महिला के लिए ही थी। परन्तु इसको अलग हटाकर मैं यह निवेदन करना चाहता हूँ कि यदि उस समय उसको ठीक समझा गया, तो प्रश्न पर प्रश्न यह है कि क्या आज हम हजारों वर्षों या इससे भी अधिक समय से ‘सपंडिता के सिद्धान्त’ के अनुपालन के बाद इसे न्यायसंगत स्वीकार करने की स्थिति में हैं कि बेटी को भी सम्पत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए किसी परिवार में क्या होता है? जब तक पिता जीवित है, तब तक पुत्र व्यापार या खेत में, मिलकर धन पैदा करने में, अपने पिता के साथ काम करता है। जब पिता वृद्धावस्था के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तब पिता के नाम की सम्पत्ति वस्तुतः पिता और पुत्र के संयुक्त प्रयत्न से अर्जित सम्पत्ति है। अब यदि यह कहा जाए कि ऐसी सम्पत्ति में बेटी का भाग होना चाहिए, जबकि बेटी ने उस सम्पत्ति को बनाने में किसी प्रकार का सहयोग नहीं दिया है। शायद तब वह अन्यत्र बच्चे पैदा कर रही थी। यह सही नहीं है। यहां मुझे गलत न समझा जाए। मैं नहीं चाहता कि बेटी को पूरे अधिकार नहीं दिए जाने चाहिए। उसे वे अधिकार मिलने चाहिए। परन्तु मैं नहीं चाहता कि यह अभिनव परिवर्तन जो ऐसे सैद्धान्तिक प्रकार का है जो हमारे देश में प्रत्येक घर को प्रभावित करेगा, किया जाना चाहिए। मैं अपने लोगों को भली-भांति समझता हूँ। चौधरी रणवीर सिंह जो जाट हैं, जानते हैं कि परिवार में उनके दामाद का किस प्रकार का स्वागत किया जाएगा। मैं 40 वर्षों से अधिवक्ता के रूप में काम कर रहा हूँ और मैं जानता हूँ कि स्वअर्जित सम्पत्ति के मामले में बेटी को तभी हिस्सा मिलता है, तब पुत्र नहीं होते। अब यदि यह अभिनव परिवर्तन गांवों में प्रारंभ किया जाता है। समस्त सम्पत्ति के मामलों में तो इसकी परेशानी का कोई अन्त नहीं होगा। यदि आज प्रत्येक घर में यदि दामाद और पिता और दामाद की माता को चाची के बेटे तथा उसके परिवार के साथ रहने देते हैं तो वे असंभव परिस्थिति पैदा कर देंगे। इसका कारण यही नहीं है कि हम अपनी बेटियों को प्यार नहीं करते। हम उनके लिए