अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 500

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उपबंधों के अनुसार एक िंहदू इसके असंशोधित उपबंधों के अन्तर्गत ऐसा कर सकता था ः बशर्ते वह यह घोषित करे कि वह गैर-हिंदू हैं। एच.एस. गौड़ ने हिंदू संहिता के पृष्ठ 457 पर एक बहुत ही मजेदार विरोधाभास का उल्लेख किया है। यह कहता हैःµ

फ्इससे पता चलता है कि विशेष विवाह (संशोधन) अधिनियम ने एक विरोधाभास पैदा कर दिया है। यदि एक हिंदू अपने को गौर-हिंदू घोषित करके विवाह करता है, तो भी उस पर हिंदू कानून लागू होता है यदि वह घोषित नहीं करता है, तो वह हिंदू कानून के अन्तर्गत (हिंदू) नहीं रहता, जो कि एक पहेली है_ एक हिंदू कब गैर-हिंदू होता है? इसका उत्तर हैः जब वह विशेष विवाह (संशोधन) अधिनियम के अन्तर्गत विवाह कर लेता है।य्

जब 1923 का अधिनियम पारित हुआµमैंने उस समय की कार्यवाही पढ़ी हैµतो ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ. गौड़ की बात पर ध्यान नहीं दिया गया और उन्हें हालात के साथ समझौता करना पड़ा। यदि वे स्वतंत्र होते, तो इस स्थिति को कभी स्वीकार नहीं करते। विशेष विवाह (संशोधन) अधिनियम के अनुसार बहुत अद्भुत स्थिति है। यदि एक व्यक्ति अपने धर्म से बाहर विवाह करना चाहता है, मानो लो एक हिंदू, एक गैर-हिंदू से विवाह करता है, तो संशोधित अधिनियम के अंतर्गत उनके पूर्व अधिकार जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम के सीमा तक अप्रभावित रहते हैं। परन्तु इसके बावजूद भी यदि वे विवाह करते हैं, तो क्या होता है? जिस निर्योग्यता का उन्हें सामना करना पड़ेगा, मैं उसके बारे में गौड़ के हिंदू कानून द्वारा उसका वर्णन करता हूँ। फ्उनके पूर्वाधिकार जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम की सीमा तक अप्रभावित रहते हैं। उन्हें गोद लेने के अधिकार सं वंचित होना पड़ता है। यदि इस प्रकार का विवाह करने वाला व्यक्ति एक दत्तक पुत्र हैं, तो उसे गोद लेने वाला पिता यदि चाहे दूसरी संतान गोद ले सकता है।य् अतः जो व्यक्ति विचारा इस प्रकार का विवाह करना चाहता है, तो उसे दत्तक पुत्र के अधिकारों से वंचित होना पड़ता है और उसका पिता एक अन्य गोद लेने को सक्षम होता है। फिर फ्इस प्रकार के विवाह से संयुक्त परिवार के टूटने में अपना प्रभाव डालते हैं।य् यह एक बहुत बड़ी अक्षमता है। यदि कोई व्यक्ति गैर-हिंदू से विवाह करना चाहता है, उसे संयुक्त परिवार के सरोकारों के मद्देनजर स्थगन करना पड़ता है। इसके बाद, उनकी सम्पत्ति का उत्तराधिकार तथा उनसे संतान की सम्पत्ति का उत्तराधिकार भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा नियमित होता है। मेरा विनम्र प्रस्ताव है कि ऐसा कोई कारण नहीं कि हम इन अक्षमताओं के साथ विकास करें। क्योंकि एक व्यक्ति, गैर-हिंदू से विवाह कर इन मुसीबतों को सामना करे, जिससे पता चलता है कि उसे इन कानूनों को त्यागना पड़ेगा, जो उसे बहुत प्रिय हैं और जो उसे अपने वंशजों से उत्तराधिकार में मिले हैं। यह एक बहुत ही गलत उपबंध हैं और इससे धोखाधड़ी तथा अन्य बुराइयां पैदा होती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि पुरानी स्थिति से नई स्थिति थोड़ी अच्छी है। मुझे ऐसे मामलों की जानकारी है, जिनमें आर्य समाजियों ने आर्य विवाह विधिमान्यकरण अधिनियम पारित होने से पहले विवाह किए परन्तु उन्होंने