अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 501

486 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वर्षों तक अपने आपको पति-पत्नी घोषित नहीं किया। वह यह घोषणा करने से डर रहे थे। उन्हें डर था कि उनके बच्चों के साथ क्या होगा? यह कह सकते हैं कि हिंदू संहिता विधेयक इस समय विचाराधीन है, अतः इस स्तर पर परीक्षण करने की कोई आवश्यकता नहीं है? मेरा अनुरोध है कि मुझे इस पर बोलने दिया जाए।

सबसे पहले मैं कहना चाहता हूँ कि मैं यह नहीं जानता कि हिंदू संहिता विधेयक कब पारित होगा। इसमें संदेह है कि यह इस सत्र में या अगले में या किसी अन्य सत्र में पारित होगा। हम नहीं जानते। दूसरी बात यह है कि यदि यह पारित हो जाता है, तो इससे हिंदू कानून के उन उपबंधों के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाएगा, जिनका उल्लेख उसमें है और इससे कानून को पारित करने में मदद मिलेगी। उन अनेक लोगों का क्या होगा जो ऐसा कानून होने के कारण विवाह नहीं कर पाएंगे? या यदि एक व्यक्ति मर जाता है, तो क्या उसका सम्पत्ति का अधिकार प्रभावित नहीं होगा? इसके साथ ही,यदि यह विधेयक कानून के रूप में पारित नहीं होता है तो अनेक ऐसे मामलों जो इस कानून से संचालित होते हैं, नहीं होंगे। उन पर वर्तमान कानून लागू होगा और लोग पीडि़त होंगे। यदि हम ऐसी व्यवस्था नहीं करते, जिससे पूरा देश सुदृढ़ और एक बने, तो पूरे देश को नुकसार उठाना पड़ेगा।

यह कहा जा सकता है कि यह विधान का एक खंड है। हम सबको विधान के ऐसे

खंडों की जानकारी है। हमें पता है कि 1946 में हमने जातियों के उपवर्गों में विवाह के विधि मान्यकरण के लिए अधिनियम बनाया था और इसके बाद बम्बई में द्विपत्नीक विवाह अधिनियम पारित हुआ और अनेक ऐसे विधेयक पारित हुए। मैं नहीं समझता कि इस विधेयक पर कोई आपत्ति करेगा। यह एक छोटा-सा उपाय है और यह प्रथम श्रेणी का विधेयक है। इसमें केवल यही व्यवस्था है कि पहले किए गए सभी विवाह वैध होंगे और भविष्य में ऐसे विवाह वैध होंगे। इसमें और अन्य किसी प्रकार का प्रस्ताव नहीं है। मैं सभा के समक्ष सीधा प्रस्ताव लाने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि मुझे डर है कि यह सदन की परम्परा है कि इस प्रकार के उपाय प्रवर समिति को भेजे जाते हैं।

मुझे इस बात की चिंता है कि इस सत्र में इसे पारित कर पायेंगे ताकि जनता यह जाने कि हम एक वर्गविहीन समाज का निर्माण कर रहे हैं। मुझे यह पता है कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसे पसन्द नहीं किया जाएगा। मैंने अपने विचार समाचार-पत्रों में व्यक्त किये हैं। ये विचार आज मैंने सदन में पढ़े हैं परन्तु इस महत्वपूर्ण कार्य में हमें किसी से डरना नहीं चाहिए। यहां तक कि महात्मा गांधी ने कहा है कि हमारा समाज वर्गविहीन होना चाहिए। वर्ग समाज के निर्माण का उचित मार्ग है यदि हम इस प्रकार के उपाय करते हैं, तो लाभान्वित आर्थिक अधिकारों और राजनैतिक अधिकारों की जो लड़ाई है, वह समाप्त हो जाएगी और हमारा समाज एक वर्गविहीन समाज होगा। मेरा सदन से अनुरोध है कि आज इसे प्रवर समिति को भेजे जाने के बाद इसे इसी सत्र में पारित किया जाए।