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माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव है किःµ
फ्कि हिंदुओं, सिखों, जैनियों और उनकी विभिन्न जातियों तथा उपजातियों के विवाह को विधिमान्य बनाने वाले विधेयक को प्रवर समिति को भेजा जाए, जिसके ज्ञानी गुरुमुखसिंह मुसाफिर, सरकार हुक्म सिंह, श्री एम. अनन्तशयनम् आयंगर, श्री देशबंधु गुप्ता, श्रीमती दुर्गाबाई, श्रीमती रेणुका रे, श्री रामनाथ गोयनका, डॉ. बक्शी टेक चन्द, लाला अंचितराम, चौ. रणबीर सिंह, श्री महावीर त्यागी और प्रस्ताव्य सदस्यों और समिति की बैठक के लिए कम से कम पांच सदस्य इसमें अनिवार्य रूप से उपस्थित होंगे।य्
सामान्य परम्परा यह है कि सदन को रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने की तारीख निर्धारित की जाती है। रिपोर्ट प्रस्तुत करने की क्या तारीख निर्धारित की जाए?
पंडित ठाकुर दास भार्गवः इस महीने के अंत तक अथवा 28 फरवरी तक।
माननीय उपाध्यक्षः इसको 28 फरवरी, 1949 तक प्रस्तुत किया जाए।
श्री के. हनुमनथैया (मैसूर राज्य)ः महोदय, मैं इस विधेयक का स्वागत करते हुए बहुत आनंदित हूँ। पंडित ठाकुर दास भार्गव ने इसके समर्थन में बहुत अच्छे तर्क दिये हैं। इसके समर्थन में और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। 1947 से हमारा नारा था ‘आजादी’ और महात्मा गांधी ने हमें ‘भारत छोड़ों’ का नारा दिया और आजादी मिलने के बाद सरदार पटेल ने संगठित होने का नारा दिया और वे इस काम को राजनैतिक मोर्चे पर कर रहे हैं और यह इस देश के लिए एक महानतम उपलब्धि है। (व्यवधान)
हमें सामाजिक मोर्चे पर भी यह कार्य करना है। मैं आपको यह ईमानदारी से कह रहा हूँ। भारत को विघटनकारी प्रवृत्तियों, जिन्हें हम देश के लिए ये साम्प्रदायिक प्रवृत्तियों कहते हैं, ये सबसे बड़ा खतरा है। विवाह एक सुरक्षा कवच है, जो इन विभिन्नताओं के बावजूद अखण्डता और स्थायित्व बनाए रख सकते हैं। यह उपाय इन दूरियों को समाप्त करने के लिए एक शुरूआत है और यह हिंदू समाज को संगठित करेगा। मैं इन मानकों का दिल से स्वागत करता हूँ। मेरा प्रस्तावक से अनुरोध है कि वे अन्य सदस्य भी शामिल कर सकते हैं, मैं श्री मती एनी मैसकरीन, एम.ए.वी.एल, को भी प्रवर समिति में शामिल कर लें।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः मुझे उनका नाम शामिल करने पर कोई आपत्ति नहीं है।
श्री के.एम. मुंशी (बम्बई-जनरल)ः मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूँ। मेरे मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव ने सहर्ष इसे एक छोटा मानक बताया है। परन्तु मेरा उनसे इस बात पर मतभेद है। यह एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मानक है। यह अब नहीं बल्कि 40 वर्ष पूर्व पारित होना चाहिए था। जब पहली बार न्यायालयों में यह मामला उठाया गया तो न्यायालयों ने विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न जातियों के हिंदुओं के बीच