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इससे संभवतः यह निर्धारित हो जायेगा कि यह उपबंध केवल उन्हीं पक्षों पर लागू है, जो जीवित हैं। यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए जो विवाह पहले हो चुके हैं और जिनमें उत्तराधिकार का मामला उठा है, वे इस उपबंधता के बाद वैध होंगे। मुझे विश्वास है कि प्रवर समिति में उचित संशोधन को लिया जाएगा। महोदय मैं प्रत्येक का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
श्री देशबंधु गुप्ता (दिल्ली)ः सदन में जिस प्रस्ताव की चर्चा हो रही है, मैं उसका समर्थन करता हूँ। जैसा कि मेरे माननीय मित्र मुंशी जी ने कहा है, मैं समझता हूँ कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपाय है। वर्षों से हिंदुओं में एकता इसलिए नहीं हो सकी, क्योंकि हिंदू समाज जातियों में विभाजित है। समय आ गया है कि बिना देर किए अब हमें इसी तरह के उपाय करने चाहिए, जिससे ये कृत्रिम बाधाएं दूर हो जाएं। मैं ऐसे मामले जानता हूँ, जिनमें ऐसे निकट मित्रों को न चाहते हुए भी सिविल विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विवाह करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने अपना ऐसा जीवनसाथी चुना था जो उनकी जाति का नहीं था। आप जानते हैं कि आर्य समाज ‘गुण’ और कर्म के आधार पर जाति प्रणाली का समर्थक रहा है और इस तथ्य के बावजूद भी आर्य समाज के संस्थापक ने यह कहा कि जन्म से कोई जाति नहीं होती। आर्य समाजियों को भी अन्य लोगों की तरह इसका नुकसान उठाना पड़ा।
वर्षों के संघर्ष के बाद आर्य विवाह विधि मान्यकरण अधिनियम पारित हुआ। परन्तु आम राय प्राप्त करते हुए मैंने पाया कि हिंदुओं ने काफी प्रगति की है और न केवल आर्य समाजी बल्कि कुछ हिंदू भी जन्म से जाति की इस प्रणाली को मान्यता प्रदान नहीं करते। अतः इसका कोई कारण नहीं है कि हम आर्य विवाह विधि मान्यकरण या सिविल विवाह अधिनियम को मानें। आज, लोगों में जागृति आई और जब एकता के बीच और राष्ट्रीय भावना के बीच जातियां दीवार बनकर खड़ी हैं, उसे तोड़ा जाना चाहिए। मैं समझता हूँ कि इस प्रकार के उपाय में विलंब नहीं किया जाना चाहिए।
यह कहा जा सकता है कि हिंदू संहिता बन रही है, इसलिए खंडों में कानून बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परन्तु मैं और मेरे मित्र यह समझते हैं कि इस उपाय, जो हिदू संहिता में दिए गए सुधारवादी विचारों का विरोध नहीं करता, को लाने में देर नहीं करनी चाहिए। यद्यपि माननीय डॉ. अम्बेडकर चाहते हैं कि हिंदू संहिता कानून के रूप में इसी सत्र में पारित हो जाए। परन्तु हमारे में से कुछ लोग इससे सहमत नहीं हैं। इसमें समय लगेगा। इसमें कुछ विवादास्पद खंड हैं और यह एक महत्वपूर्ण उपाय है। अतः, मैं अनुरोध करता हूँ कि इसका स्वागत किया जाना चाहिए और इसमें विलंब नहीं करना चाहिए।
मेरे माननीय मित्र पंडित ठाकर दास भार्गव द्वारा रखे गए प्रस्ताव का मैं हार्दिक स्वागत करता हूँ और आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर इसे स्वीकार करेंगे और हिंदू समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण उपाय को सदन इसी सत्र में पारित करेगा।