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साम्प्रदायिक मतभेदों के कारण भारत बहुत लम्बे समय से नुकसान उठा रहा है। इन सभी मतभेदों का मूल विवाह और इसके परिणाम चुनाव में दिखाई देते हैं। क्योंकि विवाह के समय ही मुख्य रूप से कोई किसी दूसरे की जाति की पूछताछ करता है। जब भी विवाह होते हैं, जातियों की पूछताछ की जाती है। दूसरा अवसर तब आता है, जब कोई चुनाव में खड़ा होता है। तब भी जातियों की पूछताछ की जाती है। अब हमने संयुक्त मतदाता सूची बनाने का निर्णय किया है और कुछ हद तक इस साम्प्रदायिक बुराई को दूर किया है। इस प्रकार राजनैतिक दृष्टि से हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। जैसा कि मेरे मित्र श्री हनुमनतैया ने अभी कहा है कि इसका श्रेय सरदार पटेल को जाता है, जिन्होंने देश में हमें राजनैतिक संगठन प्रदान किया। इस मजबूती के बाद जरूरत है, सामाजिक संगठन की। यह विधयेक इस जरूरत को पूरा करेगा। मुझे विश्वास है कि यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो विवाह मुक्त रूप से होने लगेंगे। मैं मुक्त विवाह में विश्वास रखता हूँ। अब भारत आजाद है, अतः विवाह करने की भी आजादी होनी चाहिए। इस पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। मुझे इस बात पर खेद है कि यह विधेयक हमारे जीवनकाल में बहुत देर से आया। परन्तु हमें अपनी आगामी पीढि़यों के अमल करने के लिए इसे पारित कर देना चाहिए। मुझे आशा है कि इस अधिनियम से मिलने वाली आजादी का देश की जनता लाभ उठाएगी। मैं इस प्रस्ताव का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
श्री उपेन्द्रनाथ बर्मन (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः मैं भी इस विधेयक का तथा इसे प्रवर समिति को सौंपने का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मेरे दिमाग में एक बात को लेकर दृढ़ निश्चयी हूँ। हमारी राष्ट्रीय भावना के रास्ते में जातिप्रथा एक बहुत बाधा है। जब तक यह प्रथा जारी रहेगी, हिंदू समुदाय के विभिन्न वर्ग और गैर-मुस्लिम समुदाय के विभिन्न वर्ग एक नहीं हो सकते और राष्ट्रीय भावना को उसकी संवेदनशीलता के साथ ग्रहण नहीं कर सकते। जब तक एक व्यक्ति के भी मन में यह भावना रहेगी कि वह अपने पुत्र या पुत्री का विवाह अपने पड़ोसी के पुत्र या पुत्री से नहीं कर सकता, वे एक नहीं हो सकते। मैं समझता हूँ कि इस विधेयक को पारित करने से यह बाधा दूर हो जाएगी। यह बंधुत्वभाव ही राष्ट्रीय भावना का आधार है और मैं इस विधेयक का हार्दिक स्वागत करता हूँ और आशा करता हूँ कि यह यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र पारित हो जाएगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः जहां तक इस विधेयक का संबंध है, मेरे और इस विधेयक के प्रस्तावक मेरे मित्र में इस कारण से कोई मतभेद नहीं हो सकता कि यह विधेयक उस हिंदू संहिता का एक छोटा-सा भाग है, जिसे मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेरी आपत्ति केवल इस बात पर है कि जब विधानमंडल ने सिद्धांत रूप से यह बात स्वीकार कर ली है कि हिंदू कानून को संहिताबद्ध किया जाना चाहिए, तो खंडों में विधान बनाना गलत है। मुझे इस विधेयक के सिद्धांतों पर कोई आपत्ति नहीं