अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 510

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ऽहिंदू संहिता µ जारी

माननीय उपाध्यक्षः माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः खड़े हुए।

श्री जसपतराय कपूर (यू.पी.ः सामान्य)ः अध्यक्ष महोदय, मेरा एक व्यवस्था जन्य प्रश्न है और यदि यह स्वीकार कर लिया जाता है, तो पिछले सत्र में श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा उठाए गए व्यवस्था के प्रश्न पर और आगे चर्चा बंद हो जाएगी।

अतः मुझे व्यवस्था का प्रश्न उठाने की अनुमति दी जाए।

माननीय उपाध्यक्षः पंडित ठाकुर दास भार्गव बोलने के लिए खड़े हुए हैं। पहले उनकी बात सुनी जानी चाहिए। मुझे नहीं पता वे क्या कहना चाहते हैं। व्यवस्था जन्य प्रश्न पर मेरे विचार हैं परन्तु पंडित ठाकुर दास भार्गव की बात पहले सुनी जाएगी।

पंडित ठाकुर दास भार्गव (पूर्व पंजाबः सामान्य)ः महोदय, पिछली बार जब डॉ. अम्बेडकर ने प्रस्ताव पेश किया था, तो श्री नजीरुद्दीन अहमद ने व्यवस्थाजन्य प्रश्न उठाया था कि जिस विधेयक पर प्रवर समिति ने विचार किया था, वह विधेयक सदन द्वारा भेजा गया विधेयक नहीं था। जब इस मुद्दे पर विचार चल रहा था, तो मैंने आपसे विचार करने के लिए कुछ आधार बताए थे कि क्यों वह व्यवस्थाजन्य प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण था। उस समय आपने चर्चा बंद कर दी थी और मामले को छोटा कर दिया था, जैसा कि 31 अगस्त 1948 की कार्यवाही के पृष्ठ 778 पर दिया गया है। तब आपने कहा था कि रिपोर्ट के पृष्ठ 779 पर दिए गए प्रश्नों में से दो-तीन पर उचित समय पर विचार किया जाएगा। वे दो प्रश्न ये थे कि क्या प्रवर समिति ने अनोखा तरीका अपनाया है या उसने क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर कार्य किया है। ये वे दो प्रश्न थे जब चर्चा चल रही थी, तो आपने निर्णय किया, जैसा कि पृष्ठ 780 पर दिया गया है, कि वे सभी तथ्यों का अध्ययन करेंगे और उसके बाद अपना निर्णय देंगे। मैं श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा उठाए गए व्यवस्था जन्य प्रश्न के बारे में आपके विचार के लिए कुछ बातें रखना चाहता हूँ।

माननीय उपाध्यक्षः रिपोर्ट को देखने पर पता चला कि मैंने निम्नलिखित कहा थाµमेरे पास रिपोर्ट की छपी हुई प्रति नहीं है बल्कि उसका प्रूफ है। जब श्री विश्वनाथ दास ने एक एक मुद्दा उठाया, तो मैंने कहा थाµ

फ्जैसाकि मैंने कहा है, मैं मामले पर निर्णय नहीं देने जा रहा हूँ। मैं व्यवस्था जन्य प्रश्न सहित इसको चर्चा के लिए खुला रखना चाहता हूँ, क्योंकि इसमें बड़े प्रश्न भी

ऽविधानसभा (विधायी) वाद-विवाद, खंड 1, भाग II, 17 फरवरी, 1949, पृष्ठ 614-21