अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 513

498 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हूँ कि क्या ये तथ्य सही हैं। यदि कोई सदस्य यह कहता है कि ये तथ्य गलत हैं तो पूरी बहस खत्म हो जाएगी। अतः, मैं यह बताना चाहता हूँ कि मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये तथ्य सही हैं। यदि आप इसे सही मानते हैं तो सदन का समय बर्बाद नहीं करना चाहूंगा। अतः मैं अपने आपको दो प्रकार के प्रश्नों तक सीमित रखूंगा। जोकि इससे संबंधित हैं। आपकी आज्ञा से, विषय-वस्तु के बारे में मुझे कुछ कहना है। मेरा कहना है कि प्रश्न के दो भाग हैं। पहला भाग यह है कि क्या सदन को प्रस्तुत रिपोर्ट प्रक्रिया की दृष्टि से ठीक है। दूसरा यह है कि क्या रिपोर्ट निर्धारित क्षेत्र से बाहर चली गई है।

सदन के समक्ष तथ्य प्रस्तुत करने से पहले मैं पहले प्रश्न के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। मेरा कहना है कि प्रवर समिति की रिपोर्ट तथा हमें वितरित पत्रों, जोकि पुस्तकालय में उपलब्ध हैं, से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि विधेयक को प्रवर समिति को भेजे जाने के बाद, विधि विभाग ने इस विधेयक के स्थान पर एक अन्य विधेयक प्रतिस्थापित कर दिया और उसी विधेयक पर प्रवर समिति ने विचार किया। पता नहीं कि मैं बिल्कुल ठीक कह रहा परन्तु मैंने प्रवर समिति के कुछ सदस्यों से परामर्श किया है और उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया है और इसके साथ ही प्रवर समिति की रिपोर्ट से पता चलता है... क्योंंक समिति की रिपोर्ट और असहमति टिप्पणी से पता चलता है कि किसी अन्य विधेयक पर विचार नहीं किया गया और जो विधेयक समिति को भेजा गया था, उस पर बिल्कुल विचार नहीं किया गया।

महोदय, डॉ. अम्बेडकर ने एक तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया है। यदि आप कृपापूर्वक इस तालिका को देखें हमारे समक्ष तो इसके दो भाग हैं_ पहला दिखाता है कि यह विधेयक मूल विधेयक से किस प्रकार भिन्न है। उन्होंने एक तालिका और दी है, जिसमें प्रारूप विधेयक के और प्रवर समिति रिपोर्ट में अन्तर दिखाया है। इसमें भी यही दिखाया गया है कि पुनः तैयार किए गए विधेयक पर ही विचार किया गया और मूल विधेयक पर विचार नहीं किया गया। खैर, इसे सही मानते हुए यदि यह मान लिया जाता है कि पुनः तैयार किए गए विधेयक पर ही विचार किया गया तो आपके समक्ष अब प्रश्न उठता है कि प्रवर समिति पुनः तैयार किए गए विधेयक पर विचार कर सकती है या नहीं और क्या उनकी यह कार्यवाही सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन और प्रवर समिति को सदन द्वारा दिए गए अधिकार का दुरुपयोग है कि नहीं। महोदय, अब मैं यह तो नहीं कहूँगा कि इसके पीछे कोई गलत उद्देश्य था, या जानबूझकर या अनजाने में ऐसा किया गया, या यह अच्छे के लिये या बुरे के लिए किया गया। इससे मेरा कोई सरोकार नहीं। मेरा सरोकार सिर्फ एक तथ्य से है कि प्रवर समिति ने उसे भेजे गए उस मूल विधेयक पर विचार नहीं किया जिसे इस सदन ने उनको भेजा था।

माननीय श्री के. सनतानम (रेल और परिवहन राज्य मंत्री)ः इस व्यवस्था के