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किया था जो डॉ. अम्बेडकर के हस्ताक्षर से पुनः तैयार करके प्रकाशित हुआ था और मूल विधेयक से बिल्कुल अलग था। यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है और अध्यक्ष द्वारा अपना विनिर्णय देने से पहले मैंने उनके ध्यान में ला दिया है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः मेरे पास उस विधेयक की एक प्रति है।
माननीय सभापतिः मेरे पास कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो माननीय सदस्य के पास नहीं है।
प्रवर समिति ने जिस विधेयक पर विचार किया वह मूल विधेयक के स्थान पर एक संशोधित प्रारूप था। इसलिए समिति ने उसे भेजे गए विधेयक पर नहीं बल्कि किसी अन्य दस्तावेज पर विचार किया और प्रवर समिति की वर्तमान रिपोर्ट एक नये दस्तावेज पर रिपोर्ट है और मूल विधेयक पर इसकी रिपोर्ट नहीं है। अतः प्रवर समिति द्वारा दी गई इस रिपोर्ट पर माननीय मंत्री द्वारा विचार के लिए रखा गया प्रस्ताव उचित नहीं है। व्यवस्था के प्रश्न का मूल यही है। ( श्री महावीर त्यागीः क्या यह आपका निर्णय है?) मैं समझता हूँ कि मैंने इस मुद्दे को स्पष्ट कर दिया है।
व्यवस्था का प्रश्न उठाने वाले या उसका समर्थन करने वाले श्री नजीरुद्दीन अहमद, पंडित ठाकुर दास भार्गव और श्री विश्वनाथ दास इनमें से कोई भी प्रवर समिति का सदस्य नहीं था और स्वाभाविक है कि इसलिए उन्हें इस बात की व्यक्तिगत जानकारी नहीं है कि प्रवर समिति की बैठकों में किस पर विचार किया गया। उन्होंने प्रवर समिति की रिपोर्ट में दिए गए कुछ विवरणों पर विश्वास करके यह आशंका व्यक्त कर दी कि प्रवर समिति ने उस विधेयक पर विचार नहीं किया, जो उसे भेजा गया था।
माननीय विधि मंत्री द्वारा हिंदू संहिता विधेयक पर प्रवर समिति की रिपोर्ट पर विचार के लिए रखे गए प्रस्ताव पर माननीय नजीरुद्दीन और कुछ अन्य सदस्यों द्वारा 31 अगस्त, 1948 को उठाया व्यवस्था का प्रश्न कि यह उचित नहीं है, बहुत हल्के तथ्यों पर आधारित है। इस आपत्ति को इन तर्कों से संबद्ध करके निम्नलिखित तरीके से प्रस्तुत किया गया।
अतः उठाया गया प्रश्न यह तथ्य जानने के लिए है कि क्या प्रवर समिति को भेजा गया विधेयक, जिसमें विभिन्न मूल उपबंध हैं, बिल्कुल भिन्न हैं। जिस सत्र में उसे भेजा गया था और क्या प्रवर समिति ने उस भेजे गए मूल रूप से इसके मूल उपबंधों पर विचार किया है।
इस बात पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए कि प्रवर समिति को उसे भेजे गए विधेयक में कुछ जोड़ने या कम करने या सुधार करने आदि का पूरा अधिकार है, बशर्ते कि प्रवर समिति द्वारा दिए गए सुझाव विधेयक के विषय क्षेत्र में आते हों। इस बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। क्योंकि किसी ने भी यह नहीं कहा कि प्रवर समिति ने अपने विषय-क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया है।