अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 517

502 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं अब अपने समक्ष लिखित और मौखिक साक्ष्यों की सहायता से व्यवस्था का प्रश्न उठाने वाले माननीय सदस्यों द्वारा प्रस्तुत तथ्यों की जांच कर सकता हूँ।

मैं संक्षेप में बताता हूँ कि यह विधेयक, जो पुनः स्थापित किया गया है, कैसे बना। जैसाकि उद्देश्य और कारणों से विवरण में बताया गया है कि केन्द्रीय सरकार ने अपने 20 जनवरी, 1944 के एक संकल्प के द्वारा हिंदू कानून की एक संहिता, जो कि यथासंभव पूर्ण होनी चाहिए, बनाने के लिए एक हिंदू कानून समिति बनाई। यह इसलिए किया गया कि देश में यह मांग की जा रही थी कि सभी प्रान्तों तथा हिंदुओं के सभी वर्गों के विभिन्न विषयों के लिए एक समेकित तथा एक समान संहिता बनाई जाए, इस कानून में परिवर्तन लाने की अत्यन्त आवश्यकता है ताकि यह नई पद्धति के अनुरूप बन सके, जिसके लिए हिंदू समाज तेजी से आगे बढ़ रहा है।

जब 9 अप्रैल, 1948 को इस विधेयक को प्रवर समिति को भेजने का प्रस्ताव लाया गया था, तो माननीय सदस्यों के पास विधयेक की विषय-वस्तु तथा इसके स्वरूप और इसका प्रारूप तैयार करने के लिए कोई समय नहीं था। विधि मंत्रालय ने जब यह देखा कि हिदू कानून समिति द्वारा तैयार किया गया विधेयक संहिता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है, उसने विधेयक के प्रारूप को संशोधित करने तथा उसकी कमियों को दूर करने का निर्णय किया ताकि इसमें संहिता के उपबंधों को पूर्ण रूप से समादृत किया जा सके। इसलिए उन्होंने विधेयक के भागों और खंडों को क्रमिक अनुभागों और तर्कसंगत क्रम में व्यवस्थित किया और इसके बाद उन्होंने जैसा उचित समझा प्रवर समिति के विचार के लिए कुछ सुझाव भी दिए। विधि मंत्रालय ने तो केवल प्रवर समिति के समक्ष विधेयक का एक उचित रूप रखा था ताकि प्रवर समिति अपनी बैठकों में इसे एक व्यवस्थित रूप प्रदान कर सके या प्रारूप-निर्माता से इसमें उचित परिवर्तन करवा सके।

इसके बाद विधि मंत्रालय ने संशोधित प्रारूप में किए जाने वाले परिवर्तनों की ओर प्रवर समिति के सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया था। अतः इससे स्पष्ट है कि विचार-विमर्श के प्रत्येक चरण में प्रवर समिति के सामने संशोधित तथा मूल उपबंध थे और मूल उपबंधों तथा विधि मंत्रालय द्वारा सुझाए गए उपबंधों के तुलनात्मक अध्ययन पर विचार-विमर्श हुआ।

जहां तक उपयुक्त तथ्यों के साक्ष्य का संबंध है, व्यवस्था के प्रश्न पर प्रवर समिति का केवल एक सदस्य पंडित बालकृष्ण शर्मा ने ही बोला है। पंडित बाल कृष्ण शर्मा ने सदन में कहा था कि फ्जिस विधेयक पर सदन ने हमें विचार करने के लिए कहा था वह हमेशा हमारे सामने रहा।य् जिन सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया है, ऐसा लगता है कि उन्होंने प्रवर समिति की रिपोर्ट के कुछ परिच्छेदों अथवा असहमति टिप्पणों पर विश्वास करके ऐसा किया है। मुख्य रिपोर्ट में कहा गया हैःµ