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फ्हम अधोहस्ताक्षरी, विधेयक पर विचार किए जाने के बाद संशोधित प्रारूप पर नहीं- प्रस्तुत करते हैं आदि।य् इस प्रकार उन्होंने रिपोर्ट को प्रारम्भ किया है।
उन्होंने संशोधित प्रारूप के बारे में नहीं बल्कि विधेयक पर विचार करने के बारे में कहा है। इसके बाद वे कहते हैंःµ
फ्विधानमण्डल में यथा पुनः स्थापित हिंदू संहिता के प्रारूप पर इसके पुनः स्थापित किए जाने से पहले विभागीय जांच नहीं की गई और विधि मंत्रालय में एक संशोधित प्रारूप प्रस्तुत किया है, जो कि हमारे विचार में ज्यादा संतोषजनक है। मूल विधेयक के संशोधित प्रारूप में कोई तात्त्विक परिवर्तन नहीं किया गया है, परन्तु यह मूल विधेयक के अनुरूप ही बनाया गया है और इसे वही रूप प्रदान किया गया है, जिस रूप में विधानमण्डल में विधेयक पुनः स्थापित किए जाते हैं।य्
इससे स्पष्ट है कि प्रवर समिति ने मूल विधेयक पर ही विचार किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इसके मूल विषय में नहीं बल्कि स्वरूप में परिवर्तन किया गया है।
उन्होंने मूल विधेयक के संशोधित प्रारूप पर विचार करना उचित समझा, इस कारण का उल्लेख किया है, और उन्होंने कहा हैःµ
‘‘फलतः हमने तय किया कि विधेयक के संशोधित प्रारूप पर विमर्श केंद्रित किया जाए।
इसमें शब्त फलतः महत्वपूर्ण है। मूल विधेयक और संशोधन प्रारूप के मूल उपबंधों को देखने के बाद संशोधित प्रारूप पर विचार करना उचित था, क्योंकि इसे मूल विधेयक में सुधार करके तैयार किया गया था। प्रवर समिति ने आगे कहा हैःµ
फ्हाशिए में प्रत्येक धारा का संदर्भ दिया गया है जिसमें मूल विधेयक की तत्संबंधी धारा का उल्लेख है।य्
यह एक और अकाट्य प्रमाण है। यद्यपि उन्होंने अन्तिम रूप प्रदान करने के लिए संशोधित प्रारूप पर ही विचार किया है, परन्तु मूल विधेयक के प्रत्येक खंड को भी ध्यान में रखा है, इससे खंडों के बाद लिखे नोट, जिनमें उन्होंने विधेयक के विभिन्न भागों और खंडों पर कार्यवाही की है, से और भी स्थिति स्पष्ट हो जाती है और मूल विधेयक के प्रत्येक भाग और खंड का उल्लेख किया है।
डॉ. बक्शी टेक चन्द और पंडित बालकृष्ण शर्मा के संयुक्त असहमति टिप्पणी में एक स्थान पर कहा गया है कि प्रवर समिति ने मूल विधेयक नहीं बल्कि संशोधित प्रारूप पर विचार किया है। इसकी व्याख्या जो कुछ ऊपर कहा गया है उसको ध्यान में रख कर करें। जहां उन्होंने उल्लेख किया है कि संशोधित प्रारूप पर विचार किया