हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 52

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जहां तक इस विधेयक का संबंध है, जब यह विधेयक प्रस्तुत किया गया था, मुझे याद है, इसके उद्देश्य और कारणों में यह सामने आया थाः

फ्इस विधेयक का उद्देश्य सभी प्रांतों और सभी समुदायों के हिंदुओं के लिए कानून की सभी शाखाओं में एकरूपता लाना है। इसमें हिंदू कानून के पुराने, जटिल, पेचीदा और अलग-अलग प्रावधानों को भी सरल कर दिया गया है। विधेयक के अधिकांश प्रावधान अनुमत अथवा समर्थक प्रकार के हैं, जो किसी दबाव अथवा दायित्व को आरोपित नहीं करते, चाहे वह समुदाय कट्टठ्ठरवादी वर्ग का क्यों न हो। उनका प्रभाव केवल यह है कि वे समृद्ध हो रहे हिंदू समुदाय के पुरुषों और महिलाओं को जीवन जीने की स्वतंत्रता देते हैं जो वे चाहते हैं जीना बिना किसी प्रकार के प्रभावित या खंडित किए बिना उसी प्रकार की स्वतंत्रता जो प्राथमिकता देते हों जुड़े रहने की पुराने रीति-रिवाज़ों से रहना पसंद करते हैं।य्

अब श्रीमान, इसी भावना से डॉ. अम्बेडकर ने कल भाषण दिया था। अतः हम चाहते हैं कि इसमें प्रबुद्ध और अप्रबुद्ध दोनों वर्ग समाहित हों। मेरा उनसे विनम्र निवेदन है कि जहां तक उनका संबंध है, वे सही हैं। परन्तु वे विनम्र लोग जिन्हें आप सामाजिक जीवन के मार्ग पर न तो प्रबुद्ध और न अप्रबुद्ध मानेंगे। आपने उनके लिए विधेयक में सही प्रावधान नहीं दिए हैं। डॉ. अम्बडेकर से मेरा नम्र निवेदन हैः ‘कृपा पूर्वक उन्हें भी इस धरती पर रहने दिया जाए।’

श्रीमान, इस संहिता का सारतत्व यह है कि इसमें कुछ ऐसे खास सहायकारी उपायों को सम्मिलित किया गया है। प्रगतिशीलता को बढ़ावा देते हैं और उन रिवाजों को भी मान्यता देते हैं जो इसके विपरीत होते हुए भी स्वीकार्य हैं। ऐसा कभी भी इरादा नहीं था कि स्थापित अधिकारों और कानून के प्रावधान इस निर्दयता से परिवर्तित कर दिए जाएं, इससे समाज में द्वेष पैदा हो जाएगा। हमारे सभी रिवाज़ और हमारी सभी पली हुई प्रथाएँ इस विधेयक द्वारा कुचली जा रही हैं।

जब मैं उत्तराधिकार से संबंधित अन्य प्रावधानों की ओर आता हूँ स्थिति और अधिक आश्चर्यजनक होगी। श्रीमान, अब जहां तक मिताक्षर का संबंध है हम जानते हैं कि इसका आधार सगोत्रता है और जहां तक दयाभाग का संबंध है, उसमें धार्मिक ही उत्तराधिकार का आधार है। डॉ. अम्बेडकर ने कृपापूर्वक उत्तराधिकार का एक अन्य आधार बताया है। मैं यह नहीं कहना चाहता कि वे उस गलती से काफी दूर हैं, जो कि वह कर रहे हैं। वे सही काम कर रहे हैं, परन्तु मैं नहीं जानता कि इस स्वाभाविक प्रेम और स्नेह को मापने का क्या पैमाना है। प्रेम और स्नेह शायद समझे जा सकते हैं। स्वाभाविक प्रेम क्या है, मैं नहीं जानता। हमारी संकल्पनाओं के अनुसार भाई हमारे अधिक निकट होता है। हमारी पवित्र रामायण के लक्ष्मण में प्रतिष्ठापित है। श्रीमान, चाचा लोग जो हमारे माता-पिता के समान होते हैं वे भी बहुत प्रिय होते हैं। परन्तु चाचा लोगों और भाइयों की स्थिति हिंदू