38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
संहिता में क्या है? यदि मैं यह बताऊं कि वह स्थिति किस प्रकार प्रभावित हुई है कहां वे निर्वासित किए गए हैं, जहां उन्हें उत्तराधिकारियों की सूची में रखा गया है, आपको आश्चर्य ही होगा। यदि आप कृपापूर्वक सातवीं अनुसूची देखें तो उत्तराधिकार के संबंध में हिंदुओं पर लागू किए जाने के लिए बनाई गई है, तो आप पायेंगे कि पहली धारा सात प्रकार के लोगों को शामिल करती है और श्रीमान, मैं यह जानना चाहता हूँ कि स्वाभाविक प्रेम और स्नेह का यह नया सिद्धांत इस प्रावधान से जैसे प्रभावित हुआ है। सर्वप्रथम बेटा_ विधवा_ बेटी_ यह मैं भली-भांति समझ सकता हूँ। तब आप पाते हैं, पूर्व मृतक पुत्र का पुत्र, यहां भी मैं सहमति दूंगा। तब आता है ‘पूर्व मृतक पुत्र की विधवा’ गिनाई गई। श्रीमान, मैं नहीं समझता कि स्वाभाविक प्रेम और स्नेह के कानून के अंतर्गत उसे पुत्री, पुत्र या चाचा की तुलना में कैसे वरीयता दी जाती है। मैं यह नहीं सोचता कि जहां तक स्वाभाविक स्नेह का संबंध है, पूर्व मृतक पुत्र की विधवा अथवा पूर्व मृतक पुत्र के मृतक पुत्र के पुत्र को स्वीकार किया जा सकता है। मेरा अभिमत है कि यह विधेयक गलत वैचारिकों पर आधारित है, क्योंकि यह उनके लिए ऐसी व्यवस्था करता है। मैं यह समझ सकता हूँ कि यदि यह केवल महिलाओं के लिए व्यवस्था करता हो। यदि उनके लिए अन्यत्र कोई व्यवस्था नहीं की गई, यदि वे विधवा को नहीं चाहते। परन्तु पूर्व मृतक पुत्र की पत्नी अथवा पुत्र की पत्नी चाहते हैं, तो मैं इस बात को समझ सकता हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह कानून के अनुसार है। यदि मेरे माननीय मित्र महिला संपत्ति कानून, 1937 का अध्ययन करेंगे, तो वे यह समझ लेंगे कि इन व्यक्तियों को एक श्रेणी में एक साथ क्यों रखा गया है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः डॉ. अम्बेडकर के मित्र इसे भली-भांति जानते हैं। परन्तु 1937 के अधिनियम में जब यह व्यवस्था की गई थी, तब उसमें पुत्री को सम्मिलित नहीं किया गया था।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैंने यही ही कहा है।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः आप इसे जोड़ना चाहते हैं कि पुत्री एक पिता की उत्तराधिकारी बन सके और अपने सुसर की भी उत्तराधिकारी बन सके। यह नितांत अनुचित है। मैं नहीं देखता कि आप क्यों इसके लिए व्यवस्था कर रहे हैं जब आप नई संहिता तैयार कर रहे हैं। आप ऐसे कानून बना रहे हैं, जिनमें सभी दावे संतोषजनक ढंग से पूरे होने हैं। आपको इन प्रावधानों में क्यों रखना चाहिए क्योंकि 1937 को अधिनियम में लागू था। मैं यह नहीं सोचता कि यह समिति ऐसा करने के लिए सक्षम थी। उन्हें पूरी संहिता तैयार करनी थी, जिसमें प्रत्येक दावे की पूर्ति हो। आप इसको अन्यथा न्यायसंगत नहीं ठहरा सकते। इसलिए आपने उसे कवच बनाया है। श्रीमान, यह स्थिति है।
जब मैं मूल विधेयक की धारा-2 को देखता हूँ तो ‘माता’ को अपेक्षाकृत अधिक अच्छा