अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 522

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बाबू रामनारायण सिंहः आपके द्वारा दिया गया पूर्व आदेश

माननीय उपाध्यक्षः मैंने सभी पूर्व आदेश पर विचार कर लिया है। मेरे पास वे सभी यहां हैं।

श्री वी.एल. सर्वटे (मध्य भारत)ः मैं भी व्यवस्था का एक प्रश्न उठाना चाहता हूँ।

माननीय उपाध्यक्षः क्या कोई व्यवस्था का प्रश्न है।

श्री वी.एस. सर्वटेः जी हां।

माननीय उपाध्यक्षः क्या माननीय सदस्य अपने व्यवस्था के प्रश्न के बारे में कुछ कहेंगे।

श्री वी.एस. सर्वटेः मैं संक्षेप में बोलूंगा मेरा व्यवस्था का प्रश्न यह हैः इस विधेयक के उद्देश्यों के लिए प्रकाशन संबंधी प्रावधान का पालन नहीं किया गया है। यह पीठाध्यक्ष का कर्त्तव्य है कि वह देखें कि इन प्रावधानों का पालन किया गया है। मैं नियम संख्या 20 का संदर्भ दे रहा हूँ जो कहता है किः

फ्विधेयक के पुनः स्थापित होते ही यथाशीघ्र, यदि यह पूर्व में प्रकाशित नहीं हुआ है तो राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा।य् यहां यह भी व्यवस्था है कि प्रवर समिति की रिपोर्ट को भी संशोधित विधेयक के साथ प्रकाशित किया जाएगा। मेरा उस संबंध में यह कहना है कि यह विधेयक मूलतः स्वतंत्रता से पहले अप्रैल 1947 में प्रकाशित हुआ था। अब भारत का राजनैतिक ढांचा बदल गया है। और यह परिवर्तन अच्छे के लिए हुआ है। मैं आपका ध्यान उस ओर खींचना चाहता हूँ कि जो भारतीय देशी राज्य ब्रिटिश शासन का हिस्सा नहीं थे, उन पर यह लागू नहीं होगा। इसके उपरान्त, कुछ राज्य भारत में मिल गए और कुछ अगस्त 1948 में इससे अलग हो गए। इस क्रम में यह प्रकाशन हुआ। पीठाध्यक्ष यह बात भी जानते हैं कि इन राज्यों ने अगस्त 1948 में एक प्रतिज्ञापत्र दिया है। उस प्रतिज्ञापत्र के परिणामस्वरूप केन्द्र द्वारा अपने विशिष्ट क्षेत्राधिकार या समवर्ती क्षेत्राधिकार का प्रयोग करके कोई भी विधान पारित करता है तो वह इन राज्यों पर भी लागू होगा। अतः मेरा अनुरोध है कि यह जिम्मेदारी पीठाध्यक्ष की है कि इस विधेयक से प्रभावित होने वाले उन राज्यों के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की जाए। इसका उद्देश्य दोहरा है। विधेयक के प्रकाशित होने से इससे प्रभावित होने वाले राज्यों या लोगों को अपनी प्रतिक्रियाएं, विचार और भावनाएं व्यक्त करने का अवसर मिलता है। मैं यह समझता हूँ कि प्रजातंत्र का यह मूलभूत सिद्धांत है कि जब तक किसी विधेयक पर लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान नहीं किया जाता, वह विधेयक पारित नहीं किया जाता। दूसरे, इस प्रकाशन का उद्देश्य है कि विधानसभा के सदस्यों को अपने निर्वाचन-क्षेत्र के लोगों की भावनाएं जानने का अवसर मिल जाता