508 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सदस्यों का यह कर्त्तव्य है कि वे यहां अपने व्यक्तिगत विचार न रखें। महत्वपूर्ण मुद्दों के सम्बन्ध में उन्हें अपने निर्वाचन-क्षेत्र के लोगों के विचार ही यहां रखने चाहिए। जहां तक छोटे-मोटे मामलों का सम्बन्ध है, वे अपने व्यक्तिगत विचार भी रख सकते हैं। परन्तु, जब किसी उपाय से पूरा जीवन, पूरा समाज प्रभावित होता हो, तो ऐसे महत्वपूर्ण मामलों में उन्हें अपने निर्वाचन-क्षेत्र के लोगों के विचार जानकर ही यहां प्रस्तुत करने चाहिए। उन्हें अपनी व्यक्तिगत भावना यहां प्रस्तुत नहीं करनी चाहिए। उन्हें वही करना चाहिए, जो उनके निर्वाचन-क्षेत्र के लोगों का विचार है। इसके लिए यह आवश्यक है कि विधेयक प्रकाशित किया जाए। मेरा कहना है कि यह विधेयक प्रकाशित हुआ था परन्तु उस समय भारत में मिलने वाले राज्यों या इससे अलग होने वाले राज्यों के लोगों ने इस पर इतनी गंभीरता से विचार नहीं किया था, जितना कि इस पर होने चाहिए था जो इसके लिए अनिवार्य है। अतः मेरा कहना है कि इसका उचित प्रकाशन नहीं था जैसे कि उन लोगों से सरोकार था।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः माननीय सदस्य द्वारा दो भागों में उठाए गए व्यवस्था के प्रश्न का मैं उत्तर देता हूँ। यह तो केवल विशिष्ट मामलों में ही होता है कि सदन कोई संकल्प पारित करके या सरकार किसी कार्यकारी कार्यवाही से यह इच्छा व्यक्त करे कि विधेयक इतना महत्वपूर्ण है कि इस पर लोगों के विचार जानना बहुत जरूरी है या इस पर लोगों के विचार जानने चाहिए। ऐसा कोई अधिकार नहीं है, सरकार या विधानमंडल पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। अतः इस दृष्टि से यह कोई व्यवस्था का प्रश्न नहीं है।
व्यवस्था के प्रश्न पर दूसरी बात मुझे यह कहनी है कि हमने जानबूझकर भारत के प्रांतों तक ही इस विधेयक के क्षेत्राधिकार को सीमित रखा है और जहां तक प्रान्तों का संबंध है, तीन बार लोगों के विचार जाने जा चुके हैं। और मैं यह नहीं सोचता कि चौथी बार जनमत जानने से कोई हल निकलेगा।
माननीय उपाध्यक्षः मैं विधि मंत्री से सहमत हूँ क इस विधेयक को पहली बार में भारत के प्रांतों तक ही सीमित रखा गया है। यह अभी अनिश्चित है कि भारत में मिलने वाले राज्यों पर यह लागू होगा कि नहीं और यदि ऐसा होता है, तो किन शर्तों पर। यह उस समय विचार किया जाएगा जब वे इसमें मिल जाएंगे। दूसरी बात यह है कि जब तक सदन एक संकल्प पारित न करे तब तक विधेयक को परिचालित करने के लिए कोई बंधन नहीं है।
अपराह्न 12.00 बजे
प्रवर समिति ने इस पर विचार किया है और उसके विचार में यह आवश्यक नहीं है कि इस विधेयक को राजपत्र में पुनः प्रकाशित किया जाए। इसलिए मैं इस व्यवस्था के प्रश्न को अस्वीकार करता हूँ।