510 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आवश्यक कार्यों को देखते हुए, जिन्हें सरकार के विचार में प्राथमिकता मिलनी चाहिए, मैं अपने प्रस्ताव के समर्थन में कोई भाषण नहीं देना चाहता, क्योंकि यह स्पष्ट है कि यदि मैं भाषण देता हूँ, तो इस पर बहस शुरू हो जाएगी और सरकार का बहुत समय खर्च हो जाएगा और इसलिए मैं अनुरोध करता हूँ कि इस विधेयक पर संसद के अगले सत्र में आगे विचार किया जाए।य्
माननीय उपाध्यक्षः उपर्युक्त को देखते हुए डॉ. अम्बेडकर को अपना भाषण देना चाहिए। मुझे खेद है कि इस प्रकार का व्यवस्था का प्रश्न उठाया गया। यह एक विलंबकारी प्रस्ताव है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः जैसे कि मैं कहने जा रहा था ये 16 प्रस्ताव तीन अलग-अलग श्रेणियों में हैं। कुछ तो ऐसे प्रस्ताव हैं जिनमें कहा गया है कि लोगों के विचार जानने के लिए विधेयक को पुनः वितरित किया जाए। कुछ ऐसे हैं, जिनमें विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की मांग की गई है और यह प्रवर समिति पहली प्रवर समिति से भिन्न हो। एक मांग यह की गई है कि इसे पहली समिति पुनर्स्वीकृत करने को ही भेजा जाए।
इन प्रस्तावों के बारे में श्री बी.एस. सर्वटे द्वारा एक व्यवस्था का प्रश्न उठाया गया है। आपने वह प्रस्ताव रद्द कर दिया है और इसलिए प्रस्ताव संख्या 7 और 8 को कार्य-सूची में निकाल दिया गया है। अन्य प्रस्ताव अभी हैं और उनके बारे में मैं जानना चाहता हूँ कि क्या आप चाहते हैं कि इन प्रस्तावों को मेरे अपने प्रस्ताव के साथ ही ले लिया जाए ताकि इन सब पर एक साथ ही चर्चा हो जाए और आखिकार में प्रत्येक प्रस्ताव को सदन के समक्ष अलग-अलग रखा जाए या इन प्रस्तावों को मेरे प्रस्ताव से पहले लिया जाए ताकि इनका निबटारा हो सके और मेरे द्वारा रखे गए प्रस्ताव पर मेरे भाषण के लिए रास्ता साफ हो जाए, जिन्हें मैंने श्रेणीबद्ध किया है।
रखे गए प्रस्तावों के बारे में मैं एक या दो बात अवश्य कहना चाहूंगा। मैं इस बात से सहमत हूँ कि जब तक प्रस्तावक यह नहीं चाहें कि इन प्रस्तावों पर विचार न किया जाए, आप इन पर चर्चा करवाने के लिए बाध्य हैं। कुछ प्रस्ताव ऐसे होते हैं, जिनके बारे में आप अपने स्वविवेक से निर्णय कर सकते हैं कि ये विलंबकारी नहीं है और इनमें कुछ तथ्य हैं, उनके बारे में पूर्ववर्ती अध्यक्षों द्वारा ऐसे प्रश्नों के बारे में दी गई व्यवस्था के अनुसार उन्हें सदन में रखने के लिए आप अपनी इच्छा से निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि अध्यक्षपीठ को इसके लिए संतुष्ट होना चाहिए कि इनमें कुछ तथ्य हैं और ये पूर्णरूप से विलंबकारी नहीं है।ं उदाहरण के लिए यदि कोई प्रस्ताव ऐसा है जिसमें मांग की गई है कि इस प्रस्ताव पर अब विचार न करके बाद में किसी अन्य चरण में से लिया जाए, तो इस प्रश्न पर पूर्ववर्ती अध्यक्ष पीठों द्वारा दी गई व्यवस्था के अनुसार आप स्वविवेक से निर्णय कर सकते हैं। जिस प्रस्ताव में आप यह समझते हैं कि इनमें कुछ