अनुभाग तीन - प्रवर समिति से वापस भेजे जाने के पश्चात् हिंदू संहिता पर की गई चर्चा (11 फरवरी, 1949 से 14 दिसम्बर, 1950 तक) - Page 527

512 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संबंधी प्रस्तावों को बिना किसी भाषण के रखने की अनुमति दी जाएगी। इसके बाद सभी प्रस्तावों पर बारी-बारी चर्चा होगी और मैं उन्हें एक के बाद एक रखूंगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं आपके मार्गदर्शन का आभारी हूँ। जैसा कि आमतौर पर होता है, प्रवर समिति को भेजे गए विधेयक पर इस समिति की रिपोर्ट पर प्रस्ताव रखने से पहले प्रवर समिति के सभापति सबसे पहले उन परिवर्तनों की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करते हैं, जो उसमें मूल विधेयक में किए हैं, जो उसे भेजा गया था। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि पहले इस प्रक्रिया का अनुसरण किया जाए।

महोदय, पहला भाग विवाह और तलाक से संबंधित है। जहां तक इस भाग का संबंध है, प्रवर समिति ने इसमें दो खंड जोड़े हैं, जो दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन और न्यायिक अलगाव से संबंधित है। ये खंड मूल विधेयक में नहीं थे। मूल विधेयक के प्रारूपकारों ने विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869 का हवाला देकर अपने आपको संतुष्ट कर लिया, जिसमें दाम्पत्याधिकारों के प्रत्यास्थापन और न्यायिक अलगाव संबंधी व्यवस्था है। मूल विधेयक के प्रारूपकारों ने समझा कि इन दो उपबंधों को लागू करने के लिए विधेयक में भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम का हवाला देना ही पर्याप्त होगा और इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने इस कोड में विस्तृत रूप से इसका उल्लेख करने की जरूरत नहीं समझी। प्रवर समिति का विचार कुछ अलग था। प्रवर समिति के विचार में यह हिंदू कानून एक पूर्ण संहिता बनने जा रहा है, इसलिए केवल किसी कानून का हवाला मात्र देकर इसे अधूरा छोड़ना गलत है। अतः उन्होंने सोचा कि यह वांछनीय होगा कि भारतीय विवाह-विच्छेद अधिनियम में मामलों से संबंधित उपबंधों को संहिता में भी लिखा जाए और इसके परिणामस्वरूप प्रवर समिति ने विवाह और विवाह-विच्छेद संबंधी उपबंधों को इन खंडों के रूप में विधेयक में जोड़ दिया। देखने से सदन को पता चलेगा कि मूल विधेयक और प्रवर समिति द्वारा तैयार किए गए विधेयक में कोई परिवर्तन नहीं है। जो कुछ किया गया है, वह यही है कि मूल विधेयक में जो काम का हवाला देकर किया गया था उसे संहिता में स्पष्ट और सकारात्मक रूप से संहिता में इन मामलों से संबंधित धाराओं में जोड़ दिया गया है।

जहां तक दत्तक-ग्रहण करने का संबंध है, प्रवर समिति ने कुछ नए परिवर्तन किए हैं। जब एक पिता अपना धर्म बदलने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और वह हिंदू नहीं रहता, तो मां उस पुत्र को गोद दे सकती है। दूसरे शब्दों में इसे कह सकते हैं कि पिता द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर उसे दूसरा धर्म ग्रहण करने पर अयोग्य ठहराने का उपबन्ध किया गया है और मां को ऐसे मामले में गोद देने का अधिकार होगा। परिणामस्वरूप, इन परिस्थितियों में मां को पुत्र को गोद देने का अधिकार दिया गया है। इसी प्रकार, एक विधवा को अपना पुत्र उसके पिता के जीवित न होने पर गोद देने का