हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 54

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उत्तराधिकारी समझा जाता था, क्योंकि ‘माता’ स्वतः एक श्रेणी वर्ग है और ‘माता’ अकेली ही उत्तराधिकारी है। यहां मैं स्वाभाविक प्रेम को समझ सकता हूँ। पर अब पिता को भी माता के साथ स्थान दिया गया है और वे दोनों एक साथ आते हैं। परन्तु यदि आप आगे बढ़ते हैं तो जो मेरी धारणा है, उसे अधिक अच्छी तरह समझा जाएगा। जब आप दूसरे मामले पर आते हैं तो आप पुत्र की पुत्री और पुत्री की पुत्री को कैसी पाते हैं के बारे में विचार करना होगा। पुत्र की पुत्री ने मिताक्षर कानून में विशेष स्थान पाया है और मिताक्षर के अनुसार, वह पंसदीदा उत्तराधिकारियों में से एक है। श्रीमान, अब क्या हुआ है कि विधेयक में पहली श्रेणी में पुत्री का पुत्र, माता और पिता से पूर्व आता है। पर अब पुत्री के पुत्र को सबसे नीचे के स्थान में भेजा गया है। श्रीमान, यदि आप आगे बढ़ते हैं, श्रेणी IV में भाई और बहन आते हैं। और श्रेणी V में भाई का पुत्र, बहन का पुत्र, भाई की पुत्री आती है सब अन्दर आते हैं। मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ भाई के पुत्र को, बहन के पुत्र के समान माना गया है और बहन की पुत्री के समान थी इस समानता में पागलपन है, मैं यही कहना चाहता हूँ। हम यह जानते हैं कि हमारे परिवारों में भाई और भाई के पुत्र की क्या स्थिति है। यह हमारी प्रणाली अथवा परिवार की संस्था का परिणाम है जैसा कि हम गत 1000 वर्ष से देख रहे हैं। अब हम भयंकर द्वेष-भाव से बच नहीं सकते। आप उस विधेयक में ऐस प्रावधान सम्मिलित कर रहे हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को आपका विरोधी बना देगा क्योंकि ये अभिनव व्यवहार में परिवर्तन किसी आदेश द्वारा नहीं किए जा सकते। इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार प्रत्येक हिंदू-पुरुष और महिला को अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी सम्पत्ति की वसीयत करे तथा भविष्य में प्रत्येक पुरुष और महिला इस उत्तराधिकार के स्पष्ट स्वामी होंगे। आपने मेरे हाथ में महिलाओं को हानि पहुंचाने की शक्ति दे दी है, और मेरा मन नहीं चाहता कि वह महिलाओं को हानि पहुंचाने के लिए उपयोग किया जाए। आखिरकार पिता जब मर रहा है, अपने पुत्रों की शक्ति की परिधि में होगा और तब पुत्र यह देखेंगे कि पिता अपनी वसीयत में पुत्रियों को कोई स्थान न दे। जब मैं यह कह रहा हूँ, मैं आपको बता सकता हूँ कि मेरी एक पुत्री है और मैंने उसके लिए भी तभी व्यवस्था कर दी है, जब मैंने अपने पुत्रों के लिए व्यवस्था की थी। जिस घर में मैं अपने पुत्रों के साथ रह रहा हूँ और जिस घर में मेरे पुत्र की पत्नियां रह रही हैं, मैं नहीं चाहता कि पुत्री और उसका पति, उसका ससुर और उसकी सास तथा उसका बड़ा देवर सभी आ जाएं तथा कुछ कमरों में रहने लगें। यह एक असंभव प्रस्ताव होगा।

माननीय उपाध्यक्षः इस विधेयक के अंतर्गत ससुर और सास को संरक्षित करने की कोई संभावना नहीं है।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः वे दामाद के साथ आ सकते हैं। मैं यह कहना चाहूँगा कि इस प्रकार का अवसर उनके लिए काफी अच्छा है। एक पिता अपनी पुत्री के घर का पानी भी नहीं छूना चाहता, पुत्री की सम्पत्ति लेगा और उसके पति की। मैं आ रहा हूँ परवर्ती बातों पर।