518 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अगस्त में सदन के समक्ष रखा गया था। जिसे सदन ने स्वीकार किया था और प्रवर समिति को भेजा था। ( एक माननीय सदस्यः 9 अप्रैल।) मेरा पहला कहना यह है कि प्रवर समिति ने कोई परिवर्तन नहीं किया है। प्रवर समिति ने केवल दो नए खंड इसमें जोड़े हैंµखंड 88 और खंड 89। खंड 88 में पुनीत कर्त्तव्य का सिद्धांत है। खंड 89 में संयुक्त परिवार के ऋण को अदा करने की जिम्मेदारी है। इन खंडों को जोड़ना अनावश्यक था, क्योंकि यदि आप एकबार सहभागिता तोड़ देते हैं तो पुनीत कर्तव्य के बारे में कोई स्पष्ट उपबंध करना आवश्यक नहीं है क्योंकि पुनीत कर्त्तव्य का सिद्धांत वहां लागू होता है, जहां उत्तरजीविता सम्पत्ति है? क्योंकि उत्तरजीविता के द्वारा यदि ‘ख’ की सम्पत्ति ‘क’ लेता है और ‘ख’ की सम्पत्ति कर्ज में डूबी हुई है, तो इस मामले में कोई विशेष सिद्धांत बनाना और ‘ख’ पर जिम्मेदारी थोपना उचित नहीं है क्योंकि दाय जो एक व्यक्ति को मिलता है, तो उसे लाभ और उसका कर्ज दोनों साथ ही मिलते हैं। परन्तु, मिताक्षरा के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक सहभागी को उत्तरजीविता द्वारासम्पत्ति मिलती है, जोकि मृतक की नहीं होती। पटना उच्च न्यायालय और बम्बई उच्च न्यायालय ने हम पर बड़ा सख्त दबाव डाला कि संयुक्त परिवार के मिताक्षरा सिद्धांत की इन बातों की संहिता में स्पष्ट रूप से व्याख्या कीजाए ताकि जब कोई न्यायिक व्याख्या की बात आए, तो इस संबंध में कोई विवाद, या संदेह न हो। चूंकि संहिता का एक उद्देश्य यह भी है कि कानून को सिर्फ वकीलों के ही लिए नहीं बल्कि आम नागरिक के लिए भी बिल्कुल स्पष्ट लिखा जाए। चूँकि ये सुझाव पटना और बम्बई उच्च न्यायालय की ओर से आया है, तो हमने दो बातें शामिल करना वांछनीय समझा अर्थात् पुनीत कर्त्तव्या के मूल आधार पर ऋण अदायगी का कोई दायित्व शामिल नहीं तथा परिवार संबंधी कोई पहले ऋण का इसके अतिरिक्त और कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। यदि मेरे मित्रों को अभी भी कोई संदेह है कि मिताक्षर के संयुक्त परिवार के संबंध में हमने कोई आधारभूत परिवर्तन किए हैं, तो मैं धारा 86 (भाग 5, संयुक्त परिवार संपत्ति) की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। प्रवर समिति द्वारा लिखी गई धारा 86 शब्दशः वही है, केवल कुछ मौखिक परिवर्तनां को छोड़कर, जो कि राव समिति द्वारा तैयार किए गए मूल विधेयक में भाग-तीन ‘क’ धारा 2, पृष्ठ 12 पर दी गई है। इसी प्रकार धारा 87 भी शब्दशः वही है जो राव समिति के विधेयक में भाग-तीन ‘क’, धारा 2 पृष्ठ 12 पर दी गई है। इन दोनों का मिलान करने पर पता चलता है कि सम्पत्ति के अनुपात को छोड़कर, जिसके बारे में सदन को बताया है, इसमें कोई नई बात नहीं जोड़ी गई है परन्तु राव समिति द्वारा तैयार किए मूल विधेयक का इन्हें अंग बना दिया है।
इस बार यदि कोई और संदेह हो, तो मैं राव समिति की रिपोर्ट (पृष्ठ 13) का संदर्भ देकर उस संदेह को दूर करना चाहूंगा। राव समिति में कहा गया है (पैराग्राफ 51)ःµ