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है और मुझे आशा है कि नए कानून को मानने वालों की जीत होगी। परन्तु, यदि ऐसा नहीं होता है, तो हमें इस बात की संतुष्टि होगी हमने विवाह की दो समानान्तर प्रथाओं को अनुमति दे दी है। कोई भी अपनी इच्छानुसार किसी भी प्रथा को अपना सकता है। इससे न तो किसी शास्त्र का और ना ही किसी स्मृति का उल्लंघन होगा।
जहां तक एक विवाह का संबंध है, यह एक नई चीज हो सकती है। मैं बताना चाहता हूँ कि इस सदन का कोई भी सदस्य यह नहीं कह सकता कि हमारे शास्त्रों में यह लिखा है कि कोई हिंदू पति बेरोकटोक एक से ज्यादा विवाह कर सकता है। ऐसा कभी नहीं था। आज भी, दक्षिण भारत के कुछ भागों में कुछ लोग, नाटूकोटाई चेट्टिचार का एक वर्गµयह मामला प्रिवी कौंसिल में भी आया था, इस रिवाज को मानते हैं कि एक पति अपनी पत्नी की सहमति के बिना दूसरी पत्नी नहीं रख सकता। दूसरे, जब पत्नी की सहमति मिल जाती है, तो उसे अपनी पत्नी के नाम कुछ सम्पत्ति आबंटित करनी पड़ती है, जिसे तमिल भाषा में ‘मोप्पू’ कहते हैं। वह उसकी स्थायी सम्पत्ति बन जाती है ताकि पति को विवाह की अनुमति देने के बाद यदि पति उसके साथ दुर्व्यवहार करें, तो वह स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर सके। यह उदाहरण मैंने इसलिए दिया है कि एक पति बेरोकटोक एक से ज्यादा विवाह नहीं कर सकता।
एक अन्य उदाहरण मैं कौटिल्य के अर्थशास्त्र से देता हूँ। मैं नहीं जानता कि कितने सदस्य इस पुस्तक का पालन करते हैं। मैं समझता हूँ काफी सदस्य इस पुस्तक को मानते हैं। यदि वे मानते हैं, तो वे इस बात को मानेंगे कि कौटिल्य ने दूसरे विवाह को काफी सीमित किया है। सबसे पहले, किसी पति को विवाह के दस या बारह वर्ष बाद तक दूसरे विवाह की अनुमति नहीं थी, क्योंकि उसे इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि उसकी पत्नी संतान उत्पन्न करने में असमर्थ है। एक तो यह प्रतिबंध है। दूसरा प्रतिबंध यह है कि दूसरी शादी करने के लिए पति को अपनी पत्नी को वह पूरा स्त्रीधन वापस करना पड़ेगा, जो उसे विवाह के समय मिला था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में एक हिंदू पति को दूसरा विवाह करने के लिए ये दो शर्तें दी गई हैं।
तीसरे, हमारे देश में अनेक प्रान्तों में एकल विवाह के लिए कानून पारित किया गया है। उदाहरण के तौर पर ‘मरुमाक्काथायम्’ और ‘आलियासंथनम’ कानून में एकल विवाह की व्यवस्था है। इसी प्रकार, एकल विवाह के लिए बम्बई या मद्रास और बड़ौदा ने एकल विवाह के लिए कानून बनाया है।
मुझे आशा है कि उपर्युक्त उदाहरणों से सदन के समक्ष यह स्पष्ट हो जाएगा कि हम कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं कर रहे हैं। हमारे पास विभिन्न राज्यों द्वारा पारित कानून