भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 538

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तो उसको इसकी अनुमति है। अतः इसमें किसी प्रकार की रोक नहीं है।

सेठ गोविंद दास (सी.पी. बराडः सामान्य)ः आप ऐसे ब्राह्मण को प्रबुद्ध है क्यों कहते हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे नहीं पता मेरे विचार से यह प्रबुद्ध है। आपके विचार से वह मूर्ख हो सकता है, परन्तु यह एक मतभेद है।

जहां तक एक दत्तक पुत्र द्वारा उस सम्पत्ति को चुनौती देने का प्रश्न है, जिसे विधवा ने उसे दत्तकग्रहण करने से पहले किसी अन्य को हस्तांतरिक कर दिया था। मैं नहीं समझता किस इस मामले में कोई विवाद होगा। इस बात में कोई औचित्य नहीं है कि एक दत्तक पुत्र को दत्तक ग्रहण वाले पिता की मृत्यु से ही उसका पुत्र मान लिया जाए। यह एक कोरी कल्पना है। इसका कोई अर्थ नहीं है। यह केवल एक कल्पना ही नहीं है बल्कि इसमें मुकदमेबाजी होती है और बड़ी कठिनाई आती है। अतः दत्तकग्रहण और सम्पत्ति का अधिकार साथ-साथ होना चाहिए। मैं समझता कि सदन का कोई सदस्य यह कहेगा कि इसे स्वीकार नहीं किया जाए। ( श्री बी.दास.ः हमें इसे स्वीकार करते हैं।)

इसी प्रकार, दत्तक पुत्र पर मां को पूरी तरह छोड़ देने और उसे उसके द्वारा दिए जाने वाले भरण-पोषण पर जीवित रहने के लिए मजबूर करने पर प्रतिबंध लगाने के मामलों में सदन का कोई भी सदस्य यह नहीं मानेगा कि यह उचित है। मैं समझता हूँ कि दत्तकग्रहण के अधिकार को जारी रखा जाए, जिसे रूढि़वादी समुदाय में काफी महत्त्व दिया है, परन्तु महोदय मेरी समझ में एक बात नहीं आती कि दत्तकग्रहण क्यों किया जाए। जो लोग दत्तक- ग्रहण करते हैं, उनमें से अधिकांश का नाम इतिहास में रिकार्ड नहीं होता। जहां तक मेरा व्यक्तिगत प्रश्न है, मैं नहीं चाहूंगा कि मेरा नाम इतिहास में लिखा जाए, क्योंकि मेरा रिकार्ड बहुत कमजोर है। मैं हिंदू समुदाय का एक असाधारण-सा व्यक्ति हूँ। परन्तु, अनेक ऐसे लोगं हैं जिनका कोई रिकार्ड लिखने योग्य नहीं है। यह बात समझ में नही आती कि एक बेवकूफ को, एक अनपढ़ को, एक चरित्रहीन लड़के को क्यों गोद लिया जाए, जिसका यह पता नहीं कि वह कैसा निकलेगा। उसे एक गरीब महिला पर हुक्म चलाने और उसके पास जो सम्पत्ति है, उसे उससे वंचित करने के लिए क्यों दत्तकग्रहण किया जाए। अतः मेरा कहना है कि यदि आप दत्तकग्रहण नहीं रखना चाहते हैं, तो ऐसी व्यवस्था की जाए कि दत्तक पुत्र मां को उसकी सम्पत्ति, जो उसका सहारा है, बिल्कुल वंचित न कर पाए। मैं नहीं समझता िकि इस मामले में कोई विवाद है।

जहां तक प्रथागतदत्तक ग्रहण को समाप्त करने की बात है, मैं दो बातें कहना चाहता हूँ। यह एक आम बहस है, जिसे सदन स्वीकार करेगा। वह यह है। संहिता प्रथागत