भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 539

524 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कानून के विपरीत है। यह एक मूल तर्क है। यदि आप एक संहिता को बनाए रखना चाहते हैं और उसके साथ ही एक रिवाज को भी जारी रखने और उस रिवाज को संहिता के खिलाफ इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं, जो संहिता बनाने का कोई लाभ नहीं क्योंकि एक रिवाज संहिता को समाप्त कर देता है और उसको अमान्य बना देता है। कृत्रिम दत्तक पुत्र, गोफा दत्तकग्रहण और दवैमुशायान जैसे प्रथागत दत्तक ग्रहण वास्तव में दत्तकग्रहण नहीं है। प्रिवी कौंसिल ने अपने निर्णय में कहा है कि दत्तक ग्रहण एक धार्मिक मामला है। दत्तक पुत्र सम्पत्ति प्राप्त करना एक गौण बात है। वह सम्पत्ति प्राप्त कर सकता है, वह सम्पत्ति नहीं भी प्राप्त कर सकता है, और यदि वह सम्पत्ति नहीं भी प्राप्त होता है। फिर भी धार्मिक दृष्टि से दत्तकग्रहण जैसा है। अतः मेरा कहना है कि ये प्रथागत दत्तक ग्रहण कोई दत्तक ग्रहण नहीं है। ये तो केवल दो परिवारों द्वारा एक समझौते के जरिए सम्पत्ति को अपने पास रखने का एक तरीका है।

मेरे विचार में, हमने संविधान पारित कर दिया है और राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों की एक धारा में लिखा है कि सम्पत्ति को एक या कुछ व्यक्तियों के हाथों में रखने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अतः दो परिवारों द्वार समझौता करके सम्पत्ति में हिस्सेदारी करने के फ्दवैमुशायानय् जैसे तरीकों को सहन नहीं किया जाएगा। नहीं, तो जो पक्ष ईमानदारी से दत्तक ग्रहण चाहती हैं, वे कानून के अनुसार दत्तकग्रहण क्यों नहीं करती।

माननीय उपाध्यक्षः अब एक बज चुका है। माननीय मंत्री दोपहर के भोजन के बाद अपना भाषण जारी रख सकते हैं।

तत्पश्चात् सभा की बैठक मध्याह्न भोजन के लिए 2.30 बजे तक स्थगित हुई।

सभा की बैठक मध्याह्न भोजन के पश्चात् 2.30 बजे पुनः समवेत हुई।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः न।

(श्री अनन्तशयम आयंगर पीठासीन हुए।)

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं सहभागीदारी संबंधी नियम के मामले में विवादास्पद मुद्दों पर बोलना चाहता हूँ। प्रश्न उठाया गया है कि विधेयक में ‘मिंताक्षरा’ कानून द्वारा निर्धारित सहभागीदारी को समाप्त करने की मांग क्यों की गई है। इस मामले में पूरी तरह सोच-विचार करने के बाद, इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि इस पर तीन दृष्टिकोण से विचार किया जाना चाहिए। पहली बात तो यह देखना है कि सहभागीदारी में कितनी सम्पत्ति है। यदि एक व्यक्ति के पास उसकी सम्पत्ति का बहुत बड़ा भाग सहभागीदारी सम्पत्ति का है, तो इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। अतः यह मामले का पहला प्रश्न है जिस पर विचार किया जाना चाहिए।