हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 55

40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं केवल यह निवेदन कर रहा हूँ कि महिलाएं इस प्रकार अपने अधिकारों को अधिक जोखिम में डालने की स्थिति में होंगी। पिता अपनी पुत्री को वसीयत में अस्वीकार करेगा। वह श्रेणी I के अनुसार एक उत्तराधिकारी नहीं है_ वह अपने ससुर की सम्पत्ति की उत्तराधिकारी पुत्र की पत्नी के रूप में नहीं बन सकती, वह केवल विधवा होकर ही उत्तराधिकारी बन सकती है। तब वह कहां होगी? मैं यह नहीं समझता। उसे काफी हानि उठानी पड़ेगी। श्रीमान, मैं चाहता हूँ कि महिला को अपने पूरे अधिकार प्राप्त हों। मैंने जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया हैµमैंने व्यापक उसे बड़े विचार की शक्ल नहीं दीµमैंने उसे समस्त सदन के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया है और डॉ. अम्बेडकर के विचारार्थ भी प्रस्तुत किया हैµमैं यह नहीं जानता कि इससे अन्य दूसरों पर क्या प्रभाव होगा- इसमें त्रुटियां हो सकती हैं और मैं इसके प्रमाणित नहीं करता- परन्तु इसके साथ ही मैं सोचता हूँ कि वर्तमान व्यवस्था की तुलना में यह अपेक्षाकृत अधिक अच्छी व्यवस्था होगी। सिद्धान्त यह है कि अविवाहित पुत्री, पुत्र के साथ ही समान रूप से उत्तराधिकारी बनती है। विवाह होने पर वह अपने पति की सम्पत्ति की संयुक्त स्वामिनी बन जाती है, जैसाकि पति भी अपनी पत्नी की सम्पत्ति में संयुक्त स्वामी होगा। तब दोनों ही पति के परिवार की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी बन जाते हैं।

श्रीमान, इसके बाद भाई के पुत्र के लिए क्या होगा? और बहन का पुत्र? वे दोनों ही एक स्तर के व्यक्ति हैं। भाई का पुत्र शायद उसी घर में रहता है अथवा पड़ोस में रहता है तथा प्रतिदिन सेवा करता है। किंतु बहन का बेटा इलाहाबाद या मद्रास में रहता है अथवा किसी अन्य स्थान में रहता है। वे एक समान कैसे हो सकते हैं? अन्य प्रावधानों के संबंध में भी- मैं संक्षेप में कहना चाहता हूँ- यदि यह सदन मुझे अन्य प्रावधान के बारे में भी कहने की छूट दे, तो मैं पूर्णतया तैयार हूँ। और मेरे उन परिवर्तनों के बारे में सारी टिप्पणियां हैं कि वे हमें कैसे प्रभावित कर सकती हैं, परन्तु मुझे समय लेना होगा अथवा सदन को इस प्रकार कि दूसरे सदस्यों को उनके अधिकार से वंचित होना पड़े।

माननीय सदस्यगणः आप जारी रह सकते हैं।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः ऐसे अनेक धाराणाएं हैं, जो यह बताते हैं कि यह धारा-2 के अन्तर्गत प्रावधान का आधार सगोत्रता अथवा धार्मिक और प्राकृतिक स्नेह तथा प्रेम की दृष्टि से भली-भांति स्थापित नहीं है।

इसके बाद मैं महिला के उत्तराधिकार पर आता हूँ। हिंदू संहिता विधेयक के लागू होने के बाद महिला अपने पिता और पति की सम्पत्ति की उत्तराधिकारी हो जाती है। कल्पना की जाए कि उस महिला का देहान्त हो जाता है अपने पति और बच्चों को यहां छोड़ कर, तो यह स्पष्ट है कि पति को उत्तराधिकारी का अधिकार मिल जाता है तथा बच्चे भी उत्तराधिकारी बन जाते हैं। ऐसा होना ठीक है। मगर तब जब उसके बाद पति