526 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसने अपनी अलग सम्पत्ति की आय से खरीदी है। वह भी उसकी अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति है। सातवीं, एक संतानहीन पुरुष सहभागी को बंटवारे के बाद मिलने वाला हिस्सा। आठवीं, एक एकमात्र जीवित सहभागी की सम्पत्ति, जिसकी कोई ऐसी विधवा नहीं होती जिसके पास दत्तकग्रहण का कोई अधिकार हो। नौंवी, संयुक्त परिवार के एक सहभागी द्वारा अपनी अलग से अर्जित सम्पत्ति। दसवीं, विद्या से प्राप्त लाभ। मिताक्षरा कानून के अन्तर्गत इन दस श्रेणियों की आम एक सहभागी की अपनी आय होती है।
मैं इसके बारे में उदाहरण देता हूँ। हमारे सचिवालय में सैंकड़ों क्लर्क हैं। कुछ को बहुत कम वेतन मिलता है और कुछ को मंत्रिमंडल के सदस्यों से भी ज्यादा, अर्थात् 4000 रुपये से भी अधिक मिलते हैं। ( माननीय सदस्यः क्लर्क? क्या वे क्लर्क हैं?) मेरा अर्थ अधिकारी। एक अर्थ में वे प्रतिष्ठित क्लर्क है।
मैं सदन को यह बताना चाहता हूँ कि इतनी अधिक आय, जैसे विद्या से आम, जो कि एक व्यक्ति की 4000 रुपये तक हो सकती है, तो यह आम संयुक्त परिवार के भरण पोषण के लिए संयुक्त परिवार को मिलनी चाहिए। क्या होता है? विद्या से प्राप्त आम संबंधी अधिनियम के अन्तर्गत, जिसे इसी सदन ने कुछ वर्षों पहले पारित किया था। एक व्यक्ति द्वारा विद्या से प्राप्त आय, जो विद्या उसे परिवार की सहायता से प्राप्त हुई थी, उसकी अपनी व्यक्तिगत बन जाती है। मेरा कहन यह है कि मिताक्षरा कानून में संशोधन करके इन श्रेणियों में आने वाली इनती अधिक आय को जब व्यक्तिगत आय बना दिया गया है तो सहदायिकी सम्पत्ति के नाम पर क्या रह जाता है? मेरा कहना है कि सहदायिकी सम्पत्ति के नाम पर बहुत थोड़ी-सी सम्पत्ति बच जाती है। अब मैं दूसरा प्रश्न लेता हूँ कि सहदायिकी बहुत बहुती संकीर्ण और सीमित होती है और यह संयुक्त परिवार की तरह नहीं होती है। यह कहा जाता है कि सहभागिकी प्रणाली में हिंदू सम्पत्ति सुरक्षित रहनी चाहिए, परिवार के किसी सदस्य द्वारा इसका अपव्यय नहीं किया जाना चाहिए। मैं सदन के समक्ष यह प्रश्न रखना चाहता हूँ कि यह सच है कि इस सम्पत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता, इसका अपव्यय नहीं किया जा सकता। इसका उत्तर नकारात्मक है। इस मामले में मैं पिता का एक उदारहण देता हूँ। पिता पूर्व ऋण को चुकाने में संयुक्त सम्पत्ति का हस्तांतरण कर सकता है। पिता ने एक हजार या दो हजार रुपये वचनपत्र देकर कर्ज लिया हुआ है। इसके बाद छः महीने पश्चात् वह सहभागिकी सम्पत्ति को बेचने का हकदार बन जाता है, ताकि वह उस कर्ज को चुका सके। मैं सदन से यह पूछना चाहता हूँ कि क्या पिता को अपना व्यक्तिगत या पूर्ण कर्ज चुकाने के लिए इतना बड़ा अधिकार देना उचित है। सदन को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि मिताक्षरा कानून के अन्तर्गत सम्पत्ति के हस्तांतरण के मामले में प्रबंधन और पिता दो अलग चीजें हैं। यह सच है कि एक प्रबंधक तक तक सम्पत्ति का हस्तांतरण नहीं कर सकता जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि ऐसा करना परिवार के लिए आवश्यक