भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 542

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है। लेकिन एक पिता के लिए ऐसा कोई बन्धन नहीं है। एक पिता स्वयं के लि कर्ज लेता है परन्तु वह अपने व्यक्तिगत कर्ज को चुकता करने के लिए सहभागिकी सम्पत्ति का हस्तांतरण करने का हकदार है, जबकि वह कर्ज उसने परिवार की जरूरत के लिए नहीं लिया है। उसके लिए एक बंधन है कि कर्ज कि किसी अनैतिक और अपवित्र कार्य के लिए नहीं लिया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है, तो पिता पूरी सहभागिकी सम्पत्ति को हस्तांतरित कर सकता है। इसकी कोई सीमा नहीं है।

इसी प्रकार, पुत्र का मामला है। मिताक्षरा कानून के अन्तर्गत पुत्र किसी भी समय परिवार की सम्पत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है। मैं इस तर्क को ठीक समझता यदि हिंदू कानून के अन्तर्गत ऐसा होता है कि कोई भी सहभागी सम्पत्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकता, सम्पत्ति एक सहदायिकी सम्पत्ति रहनी चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। सहदायिका सम्पत्ति को समाप्त करने का कारण सहभागिकी में स्वयं है, क्योंकि सहदायिकी कानून में ही जन्म से यह अधिकार दिया हुआ है कि सम्पत्ति के बंटवारे की मांग की जा सकती है। जिससे पूरा समाज बिखर जाता है।

तीसरे, हालांकि यदि पुत्र को सम्पत्ति हस्तांतरण का अधिकार नहीं है, परन्तु वह अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए ऋण ले सकता है, और ऋणदाता की वसूली के लिए सहदायिकी की सम्पत्ति के बंटवारे हेतु मुकदमा कर सकता है। एक अजनबी को सहदायिकी भंग करने का अधिकार है। मेरे मित्र जो इस मामले में बहुत चिंतित हैं, मैं उनसे एक बात पूछना चाहता हूँ कि जब सम्पदा का एक बहुत बड़ा भाग, परिसम्पत्तियों का बहुत बड़ा भाग सहदायिकी सम्पत्ति का हिस्सा नहीं होता है और पिता को अधिकार है कि वह अनैतिक ऋण को छोड़कर सहदायिकी की कितनी भी सम्पत्ति को हस्तांतरिक कर सकता है और पुत्र का अधिकार है कि वह किसी भी समय सम्पत्ति का बंटवारा कर सकता है, पुत्र को अधिकार है कि वह सहदायिकी सम्पत्ति पर ऋण ले सकता है और ऋणदाता को सम्पत्ति के बंटवारे के लिए मुकदमा चलाने का अधिकार दे देता है, तो क्या यह प्रणाली ठोस है, क्या यह प्रणाली सुस्पष्ट है, क्या यह प्रणाली धोखेबाजी से रहित है? मेरा कहना है कि यह वर्तमान कानून विघटनकारी है। अतः इस विधेयक में मूल रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि हिस्सा अलग होगा। आज परिस्थियां ऐसी है कि प्रत्येक व्यक्ति अलग रहना चाहता है। जैसे ही पिता की मृत्यु होती है, पुत्र दावा करता है कि जो तथ्य आज विद्यमान हैं, उन्हीं को माना जाए। विधेयक के इस मांग में ऐसी कोई मूल बात नहीं की जाती है।

मैं एक बात कहना चाहता हूँ, जो सामान्य तौर पर महसूस नहीं की जाती। मैंने शुरू में कहा था कि सहदायिकी और संयुक्त परिवार में अन्तर होना चाहिए। इस विधेयक में सहदायिकी को समाप्त किया गया है और संयुक्त परिवार को रखा गया है। संयुक्त परिवार बनाए रखने में इससे कोई रुकावट पैदा नहीं होगी। केवल एक बात की गई है कि मिताक्षरा के अन्तर्गत संयुक्त परिवार का स्वरूप वही होगा, जो दायभाग कानून के