530 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और गैर-रूढि़वादी लोग हैं, जो पुत्री पैदा करना नहीं चाहते। यदि पुत्रियां पैदा नहीं होंगी, तो इस दुनिया का क्या होगा। इसके साथ ही माता-पिता पुत्री को वह प्यार नहीं देते जो उन्हें पुत्र और पुत्री दोनों को समान रूप में देना चाहिए। परन्तु मैं प्रवर समिति द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर ज्यादा बहस के हक में नहीं हूँ और इस मामले में थोड़ा ही कहूंगा। पहली बात सदन को मैं यह बताना चाहता हूँ। समिति द्वारा उत्तराधिकारियों में पुत्री को शामिल किया जाना कोई नई बात नहीं है। माननीय सदस्य इस बात को जानते हैं कि मिताक्षरा और दायभाग के अनतर्गत उत्तराधिकार के कानून में पुत्री को शामिल किया गया है, जो कि एक संहत शृंखला है। जैसा कि सदस्य जानते हैं कि हिंदू उत्तराधिकारियों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी संहत श्रृंखला है। इसके बाद ‘स्पिनदास’ श्रेणी है और इसके बाद ‘समानोतक’ हैः इसके बाद बंधुओं की श्रेणी आती है। बंधु तीन श्रेणियों में बंटे हैंः आत्म बंधु, पितृ बंधु और मातृ बंधु संहत शृंखला उत्तराधिकारियों की एक विशेष किस्म की शृंखला जो कि गौत्रज, समानोदक और बंधु संबंधी उत्तराधिकार के मूल सिद्धांत के अनुरूप नहीं होती क्योंकि यह एक मिश्रित श्रेणी है। यह दो आधारों पर टिकी है। यह रिश्तों और धार्मिक प्रभाव पर आधारित है। यह ‘स्पिनदास’, समानोदक और बंधु श्रेणियों के लिए निर्धारित मापदण्डों का अनुरूप नहीं है।
अपराह्न 3.00 बजे
यदि आप दोनों कानूनों को मिताक्षरा और दायभाग को मानें, तो पुत्री संहत शृंखला मेंं शामिल है। मिताक्षरा और दायभाग में केवल एक ही अन्तर है। दायभाग के अनुसार उत्तराधिकार में समर्पण क्षमता आवश्यक है। इसके परिणामस्वरूप दायभाग में एक विवाहित पुत्री, एक अविवाहित पुत्र, एक विवाहित पुत्री, जिसके पास पुत्र है और एक विधवा पुत्री के लिए अलग कानून है। इसमें उस पुत्री को अधिमानता दी गई है, जो विवाहित है और जिसके पास पुत्र है। उसके बाद विवाहित पुत्री को अधिमानता दी गई है। तीसरे नम्बर में अविवाहित पुत्री है। लेकिन यह उस श्रेणी में है इसका होने का कारण यह है कि विवाहित पुत्री जिसके पास पुत्र है, वह समर्पण कर सकती है, उसका पुत्र समर्पण कर सकता है। एक अविवाहित पुत्री को कोई पुत्र नहीं होता, इसलिए वह समर्पण नहीं कर सकती। इसलिए उसे नीचे रखा गया है। परन्तु, मैं इस बात पर बल देना चाहता हूँ और सदन को भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पुत्री को संहत शृंखला में शामिल करके कोई नया काम नहीं किया गया है। वह मिताक्षरा और दायभाग कानूनों के अन्तर्गत इस शृंखला में हमेशा से थी। सिर्फ इस विधेयक में पुत्री का दर्जा बढ़ाने का नया काम किया गया है। इस विधेयक के अन्तर्गत वह पुत्र, विधवा, पूर्वमृत पुत्र की विधवा, पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र के पुत्र, पूर्वमृत पुत्र के पूर्वमृत पुत्र की विधवा के साथ उत्तराधिकारियों में शामिल है।
मूलतः और विशेषकर मिताक्षरा कानून के अन्तर्गत कोई महिला किसी भी प्रकार के हिस्से की हकदार नहीं है। वर्ष 1937 में इस कानून के परिवर्तन करके मृतक की विधवा,