भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 546

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पूर्वमृत्त पुत्र की विधवा, पोते की विधवा और पड़-पोते की विधवा को उत्तराधिकारियों में शामिल कर दिया गया था। पुत्री को शामिल नहीं किया गया था। तत्कालीन सरकार पुत्री को विधवा और पूर्वमृत्त पुत्रों की विधवाओं और पूर्व पुत्र पुत्रों के पूर्वमृत्त पुत्रों की विधवाओं के समान नहीं रखना चाहती थी। इस विधेयक में केवल यही नया काम किया गया है। पुत्री को केवल उत्तराधिकारियों के क्रम में ऊपर कर दिया गया है। ऐसा नहीं है कि उसे पहली बार उत्तराधिकारी बनाया गया है।

अब मैं उसके हिस्से की बात पर आता हूँ। जैसा कि राव समिति ने और शास्त्र जानने वाले साक्ष्यिं ने कहा है, पुत्री पुत्र के साथ उत्तराधिकारी थी और अपने पिता की सम्पत्ति में वह चौथाई भाग की हिस्सेदार थी। इसे ‘याज्ञवाल्कय’ और ‘मनु’ में स्वीकार किया गया है। मैंने एक बार 137 स्मृतियां गिनी थीं और मुझे नहीं पता कि हमारे पुराने ब्राह्मण स्मृतियां क्यों लिखते थे और उन्होंने और कार्य क्यों नहीं किया और यह कहना कठिन है कि स्मृति लिखना उस समय का उनका सर्वोच्च कार्य था। इसमें कोई संदेह नहीं कि दो स्मृतिकारों नेµ‘मनु’ और ‘याज्ञवल्कय’ ने इन 137 स्मृतियों में सबसे अधिक स्मृतियां लिखी हैं। दोनों ने ही पुत्री को चौथे भाग का हकदार बनाया है। यह बहुत खेद की बात है कि रीति-रिवाजों के कारण इसका प्रभाव समाप्त हो गया, अन्यथा स्मृतियों के अनुसार पुत्री चौथाई भाग की हकदार होती। प्रिवी कौंसिल ने जो विनिर्णय दिया है, उसके लिए मुझे खेद है। इससे कानून में सुधार करने का मार्ग बंद हो गया। प्रिवी कौंसिल ने निर्णय दिया था कि रीति-रिवाज कानून से ऊपर हैं, जिसके परिणामस्वरूप न्यायापालिका के लिए पुरानी संहिता और ऋषियों तथा स्मृतिकारों द्वारा निर्धारित नियमों की जांच करना असंभव हो गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि प्रिवी कौंसिल ने यह निर्णय नहीं दिया होता, तो कुछ वकील, कुछ न्यायाधीश इस बात की जांच अवश्य करते कि ‘याज्ञवल्कय’ और मनुस्मृति में क्या कहा गया है और स्त्री आज सम्पत्ति का कम से कम चौथाई हिस्से की हकदार होती।

मूल विधेयक में पुत्री के हिस्से को बदलकर आधा किया गया है। प्रवर समिति ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए पुत्री के हिस्से को पुत्र के बराबर कर दिया है।

मैं यह बात नहीं बता सकता कि प्रवर समिति में क्या हुआ और यह व्यवस्था किस प्रकार की गई है। मैं पूरी तरहख्...,

श्रीमती रेणुका रे (पश्चिम बंगालः सामान्य)ः सर्वसम्मति से।

माननीय उपाध्यक्षः क्या पुत्र के दुगुने हिस्से और विधेयक की व्यवस्था के अनुसार पुत्री को आधे हिस्से के बारे में कोई समझौता हुआ था।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः किसी प्रकार का समझौता नहीं हुआ। मेरे दुश्मन मेरे समर्थकों के साथ मिल गए और मेरे दुश्मनों ने सोचा कि यदि विधेयक बदतर बना तो इसकी आलोचना होगी।