532 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री एम.वी. कामथः क्या आपके कोई दुश्मन हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः स्थिति यह है कि जहां तक पुत्री के हिस्से का संबंध है, हमने यही नया काम किया है कि पुत्री के हिस्से को बढ़ा दिया गया है और उसके हिस्से को पुत्र या विधवा के बराबर कर दिया गया है। यदि आप मुझसे सहमत हैं तो कोई नया काम नहीं किया गया है और यह स्मृतियों के अनुसार किया गया है।
मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि पुत्री के हिस्से पर चर्चा करते समय हमने उत्तराधिकार की सभी प्रणालियों का अध्ययन किया है। हमने उत्तराधिकार की मुस्लिम प्रणाली का अध्ययन किया। उत्तराधिकार की पारसी प्रणाली का अध्ययन किया, हमने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम और उत्तराधिकार की निर्धारित परंपरा का अध्ययन किया है और हमने उत्तराधिकार की ब्रिटिश प्रणाली का अध्ययन किया है। किसी भी प्रणाली में पुत्री को हिस्से से वंचित नहीं किया गया है। विश्व में कोई ऐसी प्रणाली नहीं है, जिसमें पुत्री को हिस्से से वंचित किया गया हो।
महोदय, एक प्रश्न निरंतर उठाया जा रहा है, कि पुत्री को हिस्सा देने का मतलब है, परिवार का विघटन। मैं स्पष्ट रूप से बताना चाहता हूँ कि मैं इससे सहमत नहीं हूँ। यदि एक व्यक्ति के 12 पुत्र हैं और एक पुत्री है और यदि 12 पुत्र अपने पिता की मृत्यु के दिन तुरन्त सम्पत्ति का बंटवारा करते हैं और पिता की सम्पत्ति का 12वां हिस्सा प्रत्येक को मिलता है, तो क्या यदि पुत्री भी 13वें हिस्से की मांग कर ले तो यह बंटवारा ज्यादा बदतर होगा?
12 हिस्से किसी भी तरह 13 हिस्से से ज्यादा अच्छे नहीं हैं। सम्पत्ति को टुकड़ों में बांटने से रोकने के लिए उत्तराधिकार के नियम के जरिए नहीं बल्कि किसी अन्य कानून के जरिए से ऐसा करना पड़ेगा। राष्ट्रीय उत्पादन के उद्देश्य से कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिससे कि बंटवारे से सम्पत्ति से मिलने वाला लाभ कम न हो।
श्री टी.ए. रामालिंगम (मद्रासः सामान्य)ः क्या हिंदू कानून कृषि भूमि पर लागू होता है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ऐसा नहीं है। मैं तो एक आम बात कर रहा हूँ।
मैं समझता हूँ कि सदस्यों तथा जनता द्वारा उठाए गए सभी विवादास्पद मुद्दों का मैंने उत्तर दे दिया है। मैं आशा करता हूँ कि विभिन्न मुद्दों पर मेरे द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण से सदस्यों में जो इस उपाय के बारे में भ्रम था वह समाप्त हो जाएगा। वे इस बात को समझेंगे कि यह कोई क्रांतिकारी उपाय नहीं है। मेरा कहना है कि यह कोई अतिवादी उपाय भी नहीं है। मैं सदस्यों का ध्यान एक महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर दिलाना चाहता हूँ, अर्थात् राव समिति के गठन तथा रचना के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। राव समिति के