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पंडित हृदय नाथ कुंजरू (यू.पी.ः सामान्य)ः यह विधेयक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और इस पर होने वाली चर्चा पर किसी प्रकार की रोक लगाना अवांछनीय होगा। मैं समझता हूँ कि सदन के प्रत्येक वर्ग द्वारा यह महसूस किया जाना चाहिए कि इस पर अपने विचार प्रकट करने का पूरा अवसर दिया गया और वाद-विवाद की अनुमति दी गई। इस विधेयक की अच्छाइयों के बारे में हमारी कोई भी व्यक्तिगत राय हो सकती है लेकिन श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा रखे गए प्रस्ताव का विरोध करने का कोई आधार नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर ने एक व्यवस्था उद्धृत की है जो इस मामले से संबंधित नहीं है। पहली बात तो यह है कि व्यवस्था एक संकल्प के बारे में दी गई है न कि एक विधेयक के बारे में। दूसरी बात यह है कि नियमों में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि जहाँ तक एक विधेयक का संबंध है, न केवल इसे परिचालित करने बल्कि इसे पुनः परिचालित करने और न केवल इसे समिति को भेजने बल्कि इसे समिति को पुनः भेजने के लिए रखा जा सकता है, भाषा बिल्कुल स्पष्ट है। जब भी किसी विधेयक को समिति को पुनः भेजने या इसे पुनः परिचालित करने का प्रस्ताव रखा जाता है, तो यह कहकर इसका विरोध किया जाता है कि यह विलंबकारी है। यदि ऐसा होता है तो, नियमों के अन्तर्गत सदस्यों को स्पष्ट रूप से दिए अधिकार निर्रथक हो जाएंगे। हमें इस बात की बेचैनी हो सकती है कि एक प्रस्ताव, जैसा कि श्री नजीरुद्दीन अहमद ने रखा है, रद्द कर दिया गया। हम इसे अस्वीकृत कर सकते हैं परन्तु इसे प्रस्तुत करने की अनुमति न देने का कोई कारण नहीं है।
मैं समझता हूँ कि यह नियमानुसार है और घोर अन्याय है कि यदि एक ऐसे कानून को पारित करने के लिए सदस्यों के अधिकारों को कम कर दिया जाए, जिसमें हमारी गहरी दिलचस्पी है। नियमों की अपनी सुविधानुसार व्याख्या कर ली जाए चाहे बहुमत कुछ भी कहे।
श्री कृष्णास्वामी भारतीः महोदय, इसमें कोई संदेह नहीं कि नियम 52 (2) के अन्तर्गत सदस्य को अधिकार है बशर्ते कि उसे स्वीकार कर लिया जाए और यह अध्यक्ष के विवेक पर निर्भर करता है। डॉ. अम्बेडकर ने यही कहा है कि सदस्यों को प्रश्न पूछने का अधिकार है परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि प्रत्येक प्रश्न को कार्यसूची में रखा जाए, यह प्रश्न की स्वीकृति पर निर्भर करता है। आप अपने स्वविवेक से यह निर्णय करें कि क्या यह एक विलंबकारी प्रस्ताव है। आप श्री नजीरुद्दीन अहमद से कारण पूछ सकते हैं। यदि उसके द्वारा बताए गए कारणों से आप संतुष्ट हैं, तो आपको अधिकार है कि आप उन्हें प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति दें। डॉ. अम्बेडकर ने यही बात कही है। प्रत्येक सदस्य को बोलने तथा अवसर प्राप्त करने का अधिकार है। आपको केवल प्रक्रिया के बारे में सोचना है और प्रक्रिया यह है कि एक प्रस्ताव तभी प्रस्तुत किया जा