542 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अधिकार कुछ शर्तों पर निर्भर करता है जैसे कि प्रश्नों के मामले में होता है। जब तक प्रश्न नियमों के अन्तर्गत एक श्रेणी या दूसरी में नहीं आता, तो अध्यक्ष इसको अस्वीकृत करने के लिए स्वतंत्र है। इसी प्रकार स्थगन प्रस्ताव में होता है। इसके लिए छः शर्तें पूरी की जानी चाहिए। अनुमति लेने का भी उपबंध है। सबसे पहले यदि अध्यक्षपीठ उचित समझे तो यह कह सकते हैं कि यह जनहित में नहीं, यह पुराना है, आदि। दूसरे यदि वे इसे स्वीकार करना चाहते हैं, तो पूछ सकते हैं कि क्या इस प्रस्ताव को सदन के सब सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। इसके बाद अनुमति दी जाती है। ऐसे मामलों में विशेष उपबंध किए गए हैं। परिचालन के लिए रखा गया वर्तमान प्रस्ताव इस में अथवा दूसरी श्रेणी में नहीं आता।
जहां तक पृष्ठ 81 पर दिए गए नियम 120 का सम्बन्ध है। यह प्रवर समिति के प्रस्तावों के बारे में हैं। इस बारे में अब तक अध्यक्षपीठ की कोई व्यवस्था मुझे नहीं मिली है। इन दोनों पुस्तकों में फ्अध्यक्षपीठ के निर्णयय् में यह नहीं कहा गया कि पुनः परिचालन के लिए रखा गया प्रस्ताव विलंबकारी है। इन परिस्थितियों में, मैं सदन की शक्तियों को कम नहीं करना चाहता। यदि मैं प्रस्ताव को स्वीकारता हूँ, तो यह न समझें कि सदन इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है। यह प्रस्तुत भी होता है, तो यदि सदन इससे संतुष्ट नहीं है,तो इसे अस्वीकार कर सकता है। इन परिस्थितियों में, इस मुद्दे पर व्यवस्थाएं स्पष्ट नहीं हैं, मैं इस प्रस्ताव को रद्द नहीं करना चाहता। माननीय सदस्य जारी रख सकते हैं। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि जिन सदस्यों के नाम प्रस्ताव हैं, वे पहले प्रस्ताव प्रस्तुत करेंगे और उन सभी पर एक साथ वाद-विवाद होगा। अगला प्रस्ताव पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गव और श्री झुनझुनवाला के नाम है।
पंडित मुकुट बिहारी लाल भार्गवः मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव मूलतः समान है। अतः मैं उस प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ।
माननीय उपाध्यक्षः प्रस्ताव प्रस्तुत न करने के लिए कोई कारण बताने की आवश्यकता नहीं है। श्री झुनझुनवाला जी आप क्या चाहते हैं?
श्री बी.पी. झुनझुनवाला (बिहारः सामान्य)ः मैं अपने मित्र श्री भार्गव का समर्थन करता हूँ।
माननीय उपाध्यक्षः अतः वे प्रस्तुत नहीं करना चाहते। मैं पहले ही कह चुका हूँ प्रस्ताव संख्या 7 और 8 नियमानुसार नहीं हैं। इस विधेयक का क्षेत्राधिकार प्रान्तों के लिए है न कि मिलने वाले राज्यों के लिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः जो राज्य पूरी तरह भारत संघ में मिल चुके हैं उनके लिए अलग व्यवस्था है। पूर्वी राज्य उड़ीसा प्रान्त में मिल गए हैं। वे अब भारत के अंग हैं। यह विधेयक पर लागू होगा।