भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 558

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माननीय उपाध्यक्षः मैं इसका अर्थ कुछ इस तरह समझता हूँµक्या वे किसी प्रान्त के साथ मिल गए अथवा नहीं, यदि वे किसी प्रान्त का अंग हैं, तो उन पर यह विधेयक लागू होगा। यह आवश्यक नहीं है कि राजपत्र की प्रति प्रत्येक गांव को तथा देश के कोने-कोने में भेजी जाए। यदि कोई राज्य किसी प्रान्त का अंग बन गया है, तो उसे उस प्रान्त के सभी अधिकार और जिम्मेदारियां मिल जाती हैं। मुझे इसका कोई कारण नहीं दिखाई देता है कि यह विधेयक पुनः परिचालित किया जाए। अतः मैं व्यवस्था देता हूँ कि प्रस्ताव संख्या 7 नियमानुसार नहीं है। प्रस्ताव संख्या 8 भी नियमानुसार नहीं है। क्या श्री भार्गव जी आप प्रस्ताव संख्या 9 को प्रस्तुत करना चाहते हैं।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं करना चाहता।

माननीय उपाध्यक्षः अगला संशोधन। श्री नजीरुद्दीन अहमद जी।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः महोदय, मैं जो प्रस्ताव रख चुका हूँ उसका एक वैकल्पिक प्रस्ताव रखना चाहता हूँःµ

फ्कि जिस प्रवर समिति को 9 अप्रैल, 1948 को मूल विधेयक भेजा गया था, उसी प्रवर समिति को और आगे रिपोर्ट देने के लिए इस विधेयक को पुनः भेजा जाए।य्

माननीय उपाध्यक्षः संशोधन प्रस्तुत हुआः

फ्कि जिस प्रवर समिति को 9 अप्रैल, 1948 को मूल विधेयक भेजा गया था, उसी प्रवर समिति को और आगे रिपोर्ट देने के लिए इस विधेयक को पुनः भेजा जाए।य्

श्रीमती रेणुका रेः अध्यक्ष महोदय की व्यवस्था के अनुसार यह नियमानुसार नहीं हैं। यह अध्यक्ष महोदय की व्यवस्था का उल्लंघन है।

माननीय उपाध्यक्षः पुनः परिचालित करने का प्रस्ताव सदन के समक्ष है। सदन इस प्रस्ताव पर भी विचार क्यों नहीं करना चाहता?

श्रीमती रेणुका रेः यह अध्यक्ष महोदय द्वारा एक दिन दी गई व्यवस्था के खिलाफ है।

माननीय उपाध्यक्षः क्या मैं महिला सदस्य से पूछ सकता हूँ कि यह किस प्रकार अध्यक्ष की व्यवस्था के खिलाफ है।

श्रीमती रेणुका रेः अध्यक्ष ने व्यवस्था दी है कि यह विधेयक उस विधेयक जैसा है, जो प्रवर समिति को भेजा गया था और इसलिए इसे पुनः प्रवर समिति को भेजने का प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता। इस विधेयक में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किया गया है।