भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 563

548 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वालों में एक समूह उन व्यक्तियों का है जो इसका विरोध उसी दृष्टि से करते हैं जिस दृष्टि से सती प्रथा को उठाने के लिये जो कानून बनाया गया था उसका विरोध किया गया था। ईश्वरचन्द विद्यासागर ने विधवा विवाह के सम्बन्ध में कानून बनवाया, उस समय जिस दृष्टि से उसका विरोध किया गया था_ श्री शारदाजी ने बाल विवाह रोकने के लिए कानून बनवाना चाहा, उस समय जिस दृष्टि से उसका विरोध किया गया था। शारदा विधेयक के समय मैं कौंसिल ऑफ स्टेट में था और उस समय के उस विधेयक के विरोध का हाल मैं स्वयं जानता हूँ। यह वह समूह है जो यह मानता है कि हमारे वेदों में, हमारे शास्त्रों में, हमारी स्मृतियों में, जो कुछ लिखा गया है, उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं हो सकता। मैं उस समूह का नहीं हूँ। हमारे धर्मशास्त्रों को भी यदि देखा जाए तो पता लगेगा कि समय-समय पर अगर एक ऋषि ने कुछ कहा तो दूसरे ऋषि ने दूसरी बात कही। यदि यह बात न होती तो आज एक सौ से ऊपर स्मृतियां हमारे ऋषियों ने न बनाई होती। अगर उन स्मृतियों को देखा जायेगा तो मालूम होगा कि एक स्मृति जो कुछ कहती है दूसरी स्मृति वही बात नहीं कहती। दूसरी स्मृति दूसरी बात कहती है तो जैसा मैंने आपसे कहा कि जितने सुधार हुए हैं उन सब सुधारों के विरुद्ध जो समूह आवाज उठाता है, उस समूह में मैं नहीं हूँ।

विरोध करने वाला दूसरा समूह वह है जो यह तो मानता है कि हमको इन विषयों में सुधारों की आवश्यकता है परन्तु साथ ही वह यह भी मानता है कि इस समय वह कानून हमारे सामने लाया जाना उचित नहीं है। यह तब आना चाहिये कि जब नया चुनाव हो जाये, नये चुनावों के पश्चात् जब हमारे नये प्रतिनिधि आ जाएँ उस समय उनके सामने यह कानून लाया जाये। मैं यह कहना चाहता हूँ कि यदि हिंदू कानूनों में इस समय कोई परिवर्तन न किया जाए और तीन वर्ष बाद भी किया जाए तो कोई अनर्थ नहीं होगा। यह एक ऐसा विषय है जिस पर देश को विचार करना है, हम सब को विचार करना है, जो यहां पर मौजूद हैं उनको विचार करना है, जो भविष्य में यहां पर आने वाले हैं उनको विचार करना है इसलिये जो दूसरा समूह यह कहता है कि इस विधेयक को लेने का न यह उपयुक्त समय है और न उपयुक्त स्थान है। मेरा यह मत है कि उस समूह के कहने में बहुत अधिक बल है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमको इस पर अवश्य विचार करना चाहिये।

जो इस कानून के पक्ष में हैं, वे भी, जैसा मैंने कहा, दो समूहों में बांटे जा सकते हैं। एक तो वे हैं जो हमारी किसी भी प्राचीन परम्परा को देखना ही नहीं चाहते, जो इस बात पर भी विचार नहीं करना चाहते कि यह देश एक प्राचीन देशों में से है, इस देश का एक

ऽसंविधान सभा (विधायी) ड., खंड 2, भाग II, 24 फरवरी, 1949, पृष्ठ 861-71