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विशेष इतिहास है, इस देश की एक विशेष संस्कृति है, इस देश की एक विशेष परम्परा है। इस प्रकार के सुधारक लोग हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करना चाहते कि हमारे यहां पहले क्या था और आज हमको अपने देश का निर्माण कैसे करना है। इस प्रकार के सुधार न प्राचीन इतिहास का ध्यान रखना चाहते हैं और न प्राचीन संस्कृति और प्राचीन परम्परा का ही। मैं कहना चाहता हूँ कि यदि इस प्रकार का सुधार इस प्राचीन देश में हुआ तो यह भारतवर्ष, भारतवर्ष नहीं रह जायेगा, यह और कुछ ही हो जायेगा। सुधारकों का दूसरा समूह वह है जो यह मानता है कि सुधार तो करना चाहिये, परन्तु हमें सुधार करते समय अपने प्राचीन इतिहास, अपनी प्राचीन संस्कृति और अपनी प्राचीन परम्परा को देखना चाहिये। मैं पहले समूह में नहीं हूँ परन्तु दूसरे समूह में हूँ। मैं यह मानता हूँ कि सुधार करना अत्यन्त आवश्यक है_ परन्तु सुधारों की आवश्यकता होते हुए भी हमको अपनी प्राचीन परम्परा, प्राचीन सभ्यता और प्राचीन संस्कृति का ध्यान रख कर सुधार करना चाहिए।
इस समय जब हमारा संविधान बन रहा है, जब संविधान के मौलिक अधिकारों को और निर्णायात्मक अधिकारों को हम पारित कर चुके हैं और जब यह आशा की जाती है कि अगली 16 मई और 15 अगस्त के बीच हमारा संविधान पूरा बन जाएगा तब यदि यह कानून नये संविधान के अनुसार आता तो उपयुक्त बात होती। आज जब हम इस देश को फ्सेक्यूलर स्टेटय् कहते हैं। आज जब हम यह मानते हैं कि इस देश के नागरिकों को, हर एक धर्म को मानने वाले कोµहर एक जाति को चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, सिख हो, पारसी हो कोई भी क्यों न होµसमान रूप से नागरिक अधिकार होने चाहिये तो मैं यह कहता हूँ कि डाक्टर अम्बेडकर साहब को एक ऐसा विधेयक यहाँ पर लाना चाहिये था जिसका हिंदुओं से ही सम्बन्ध न होता बल्कि जो इस देश के रहने वाले सभी लोगों पर लागू होता। अपने देश को फ्सेक्यूलर स्टेटय् मानते हुए एक हिंदू संहिता बिल को लाना मुझे एक असंगत बात मालूम पड़ती है।
अब यदि हम इस बिल की ओर देखें तो हमें यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी की इस बिल मेंख्...,
श्री आर.के. सिधवाः डॉ. अम्बेडकर साहब ने प्राचीन शास्त्रों को बताया। आप यह बतायें कि कौन या शास्त्र हिंदू संहिता के खिलाफ है।
सेठ गोविन्द दासः अब यदि विधेयक को हम देखें तो हमें मालूम होता है कि इस विधेयक में कई धाराएं ऐसी हैं जिन धाराओं को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये और यदि यह विधेयक नहीं रुका और पारित हुआ तो मेरा विश्वास है कि हम उन धाराओं को बिना विशेष वाद-विवाद के स्वीकार करेंगे। परन्तु इसी के साथ हमें यह भी दिखाई देता है कि कई धाराएं इसमें ऐसी भी हैं जिन्हें स्वीकार करने में बड़ी आपत्ति हो सकती है और स्वयं डॉ. अम्बेडकर साहब ने आज बतलाया है कि कई धाराएं