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पड़ेंगे। डाक्टर अम्बेडकर साहब, जो बहुत विख्यात वकील हैं, इस बात को जानते हैं कि जितने वसीयतनामे आजकल लिखे गये हैं उनमें से कितने प्रतिशत वसीयतनामे कचहरियों में आये और कितने वसीयतनामों पर मुकदमे चले। मुझे भय है कि जो अधिकार आप सम्पत्ति के उत्तराधिकार का लड़कों और लड़कियों को इस कानून के मुताबिक देना चाहते हैं, उसमें ज्योंहि वसीयतनामा आया त्यों ही वह सम्पत्ति ने लड़कों को मिलेगी और न लड़कियों को मिलेगी। वह सब वकीलों के यहां चली जाएगी।
फिर एक बात और होगी। डॉ. अम्बेडकर साहब चाहते हैं कि लड़कियों की भी सम्पत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार दिया जाए। तो मैं अर्ज करना चाहता हूँ कि जिस तरह का आज हमारा समाज संगठित है, उसमें जो पिता वसीयतनामा करेंगे वे लड़कियों को कुछ नहीं देंगे, वे लड़कों को ही देंगे और वे स्त्रियों को उत्तराधिकार देने का आपका उद्देश्य है इससे पूरा नहीं होगा। मैं उत्तराधिकार के सम्बन्ध में यह कहना चाहता हूँ कि उत्तराधिकार का विषय बड़ा जटिल है, जैसा कि डाक्टर अम्बेडकर साहब ने भी खुद कहा है। हमको तो ऐसा लगता हैµचाहे हम साम्यवादी या समाजवादी न हों- कि एक तरफ से उद्योगपतियों की आवाज उठी हुई है कि इस देश में उद्योग-धंधे नहीं बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ उत्तराधिकार का प्रश्न उठा हुआ है, अतः सबसे अच्छा तो यह हो कि आप व्यक्तिगत सम्पत्ति को ही समाप्त कर दें। यदि यह व्यक्तिगत सम्पत्ति समाप्त होकर एक नई सामाजिक रचना हो, ऐसी सामाजिक रचना जो साम्यवाद और सामाजवाद के सिद्धान्तों पर हो, यह मैं नहीं कहता, पर यह व्यक्तिगत सम्पत्ति को समाप्त करके एक नये प्रकार की सामाजिक रचना की जाये, मैं इस पक्ष में हो गया हूँ। यदि हमारे पूंजीपति देखेंगे तो उनको मालूम होगा कि यह सम्पत्ति उनके भी कोई कल्याण की चीज नहीं है। मैं उसी वर्ग में से आता हूँ जो पूंजीपति कहा जा सकता है। परन्तु हम देखते हैं कि आखिर इस सम्पत्ति से सच्चा सुख किसे मिल रहा है। मैंने किसी भी ऐसे श्रीमान् को नहीं देखा कि गरीब का पेट तो आधा सेर या तीन पाव से भरता है, तो श्रीमान् का पेट 10 या 20 सेर खाकर पचा सकता हो। मैंने कोई भी ऐसा श्रीमान् नहीं देखा कि अगर गरीब आदमी का शरीर पांच या सात गज कपड़े से ढकता हो तो श्रीमान्, सौ, दो सौ, चार सौ गज इकट्ठा पहन लेता हो।
माननीय मौलाना अब्दुल कलाम आजाद (शिक्षा मंत्री)ः कुछ लोग युद्ध करते हैं।
सेठ गोविन्द दासः और मुझे तो महलों में रहने का अभ्यास है और मैं कहना चाहता हूँ कि अगर किसी श्रीमान् को उनके महल में किसी बड़े हाल से सुला दिया जाए तो उनको नींद नहीं आती। सोने के लिए तो 12 या 14 फुट का कमरा ही चाहिए। आजकल सम्पत्ति एक दुःख हो गया है अमीर के लिए भी। जिनके पास यह नहीं है, उसको पाने की और जिसके पास है उनको उसके मारे इतनी मुसीबत है कि वे चैन से रह नहीं सकते।