भारतीय गैर-न्यायिक भारत - Page 570

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जिस प्रकार उन्होंने सती प्रथा के सम्बन्ध में जो विधेयक आया था उसका, या विधवा विवाह के सम्बन्ध में या बाल विवाह के सम्बन्ध में जो विधेयक आया था उसका विरोध किया था, वे ठीक नहीं कर रहे हैं। पर इसी के साथ मैं यह भी मानता हूँ कि यह विधेयक इस समय ठीक अवसर पर उपस्थित नहीं हुआ है और हमें इस समय इस पर विचार न कर लोगों की राय लेकर आगे इसको पेश करना चाहिए। इतने ही शब्दों के साथ मैं न तो इसका समर्थन करता हूँ और न इसका विरोध करता हूँ।

ऽश्रीमती सुचेता कृपलानी (यू.पी.ः सामान्य)ः महोदय, जब से प्रभुत्तासम्पन्न विधानमण्डल बना है, तब से कोई भी विधान इतना विवादास्पद नहीं रहा, जिनता कि हिंदू संहिता विधेयक। यदि विवाद हिंदू कानून में परिवर्तनों के कारण और गुणावगुण पर आधारित होता, तो अच्छा होता, परन्तु अधिकतर विवाद, असंगत मुद्दों पर है। इस संहिता के विरुद्ध यह प्रचार किया जा रहा है कि धर्म खतरे में है। यह कहा गया है कि इससे हिंदू धर्म की जड़ें हिल जाएंगी। जो ऐसा कह रहे हैं, वे अपने ही धर्म के साथ अन्याय कर रहे हैं।

हिंदू धर्म मूलतः व्यक्ति की आत्मिक मुक्ति पर आधारित है। यह आत्मानुभूति का मार्ग दिखाता है। एक व्यक्ति को स्वपूर्ति के लिए सत्य, न्याय अहिंसा आदि जैसे नैतिक आत्मिक सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। ये बातें हमारे धर्मग्रंथों में दी गई हैं। ये अपरिवर्तनीय और आधारभूत हैं। सामाजिक व्यवस्थ, बातचीत और रीति-रिवाज, जो युगों में विकसित हुए हैं, धर्म नहीं है। हिंदू संहिता में हिंदू धर्म के साथ छेड़खानी करने की नहीं अपितु हिंदू सिविल कानून में संशोधन करने की बात कही गई है। कानून समय-समय पर बदला है। यह धर्म से अलग है और कभी अपरिवर्तनीय और स्थायी नहीं रहा है। धर्म शास्त्रों के लेखकों ने समुदाय की तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुसार इसमें परिवर्तन किए हैं। अंग्रेजों के यहां आने के बाद, हिंदू कानून कठोर और स्थायी बन गया।

हिंदू धर्म की यह विशेषता रही है कि इसके मूल सिद्धान्तों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, परन्तु बदलती परिस्थितियों के अनुसार हिंदू सामाजिक संस्थाओं में परिवर्तन किया गया है। निरंतर अनुकूलनशीलता हिंदू धर्म की शक्ति है। जब तक हिंदू समाज स्थायी नहीं होता, कानून में बदलती परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होना चाहिए। हम जानते है कि स्मृतियाँ भी अपरिवर्तनीय नहीं रही हैं। स्मृतियों में उत्तराधिकार और विवाह संबंधी कानून को शामिल करने के अतिरिक्त कानून की अन्य शाखाओं को भी शामिल किया गया है। इनमें भारतीय विधानमण्डल में कार्यवाही हुई है और कुछ को निरस्त कर दिया गया है। हिंदू धर्म लड़खड़ाया नहीं है। हिंदू धर्म झटके झेल कर भी जीवित है। यदि हिंदू

ऽसंविधान सभा (विधायी) वाद-विवाद, खंड 2, भाग II, 24 फरवरी, 1949, पृष्ठ 866-924