556 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
धर्म इन परिवर्तनों को झेल सकता है, तो मुझे विश्वास है कि इसमें थोड़े और परिवर्तन किए जाने के बाद भी यह जीवित रहेगा। हमने बहुत ही महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं। हमने सती प्रथा समाप्त की है। हमने बाल-विवाह और कुछ हद तक अस्पृश्यता समाप्त की है। हिंदू धर्म एक बहुत ही उदार धर्म है। अतः यह कहना कि हिंदू धर्म खतरे में है, उचित नहीं है। इस उदार धर्म में विभिन्न मतों, रीति-रिवाजों के लोगों को आश्रय मिला हुआ है। आज क्या हुआ है? हमने अपने धर्म में विश्वास क्यों खो दिया है, जिसके कारण आवाज उठाई जा रही है कि हिंदू धर्म खतरे में है? इसका मतलब यह नहीं है कि जिसने भी इसका विरोध किया है, वे रूढि़वादी और प्रतिक्रियावादी हैं। मैं केवल यह कहना चाहती हूँ कि अपनी बात पर बल देकर आप अपने धर्म के साथ यह कह कर अन्याय कर रहे हैं कि हिंदू धर्म खतरे में है।
एक तर्क यह दिया गया है कि इस विधेयक पर इस समय विचार नहीं किया जाना चाहिए और कि हमने लोगों को विधेयक के उपबंधों की जानकारी लेने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया है। जहां तक मेरी जानकारी है, यह विधेयक पिछले दस वर्षों से सदन और देश के सामने है। इस विधेयक में दिए गए उत्तराधिकार विधेयक और विवाह विधेयक जैसे कुछ उपाय 1943 में सदन के समक्ष रखे गए थे। इसका रिपोर्ट 1945 या 1946 में प्रकाशित हुई और इसके प्रारूप का तेरह भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। प्रारूप विधेयक की हजारों प्रतियाँ परिचालित की गईं। इसके बावजूद भी यदि हमें इसके उपबंधों की जानकारी नहीं है, तो यह सरकार की नहीं बल्कि हमारी गलती है। इसके अतिरिक्त, यह विधेयक कोई एक दिन में पारित नहीं हो जाएगा। इस पर विचार करने में काफी समय लगेगा। जब विस्तार से इस पर चर्चा होगी, तो इस पर काफी समय लगेगा। उस समय हमारे पास जनता के समीप जाने, उसके इसके उपबंधों की जानकारी देने और जनता के विचार जानने के पर्याप्त अवसर होंगे। यह बड़ा ही आश्चर्यजनक प्रचार किया जा रहा है कि अगले चुनावों तक विधेयक को स्थगित किया जाना चाहिए। इसे स्थगित क्यों किया जाना चाहिए? क्योंकि हमारी पार्टी की लोकप्रियता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? क्या कांग्रेस के लिए ऐसा कहना उचित है? क्या हमने कभी कर्त्तव्य से पहले अपनी लोकप्रियता की तरजीह दी है? यदि हम समझते हैं कि विधेयक उचित है, यह लोगों की भलाई के लिए है, तो हमें आगे बढ़ना चाहिए। अगले चुनावों में मत प्राप्त करने के लिए इस विधेयक को रोकना उचित नही है। यह ईमानदारी नहीं है। हमारे लिए लोगों की भलाई सबसे पहले है। यदि हम इस बात को ध्यान में रखते, अगर हमारा दृष्टिकोण ऐसा नहीं है, तो हम कभी भी आमूल परिवर्तन नहीं कर पाएंगे। हमारे जीवन का क्षेत्र कोई भी हो, जब भी कभी आमूल परिवर्तन होता है, तो हमें निहित स्वार्थों और स्थापित रीति-रिवाजों का सामना करना पड़ता है। ऐसे परिवर्तनों के खिलाफ हमेशा शोर मचता है। यदि हम इस आधार पर सुधार नहीं करते, तो हम कभी भी कोई परिवर्तन नहीं कर पाएंगे।