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मैं यह कहना चाहती हूँ। हिंदू संहिता विधेयक के बारे में बहुत-कुछ कहा गया है। मैं यह कहना चाहती हूँ कि इस विधेयक का समर्थन करने वाले लोग भी बहुत योग्य और विचारशील हैं। और इन योग्य और विचारशील लोगों में केवल महिलाएं ही नहीं हैं। इस विधेयक के समर्थन में अनेक पुरुष भी हैं। हमारे अन्य देशों के इतिहास में भी देखा है कि जब भी कोई आमूल परिवर्तन किया गया है, जब भी कोई सुधार किया गया है, तो बहुत कम लोगों ने इसका समर्थन किया, बहुत कम लोगों ने इसका प्रचार किया और लोगों को शिक्षित किया और कुछ समय के बाद लोग इसके अनुसार ढल गए। अतः मुझे विश्वास है कि हिंदू संहिता के विरुद्ध कितने भी लोग क्यों न हों, यदि यह न्यायोचित और उचित है, तो जनमत हमारे साथ हो जाएगा। वे केवल हमारा समर्थन ही नहीं करेंगे बल्कि यदि यह पारित हो जाता है तो कुछ समय बाद हमें दुआएं देंगे। ( एक माननीय सदस्यः वे पहले ही हमारे साथ हैं)। वे कहते हैं कि बहुमत हमारे साथ है। उनके लिए मेरा यह उत्तर है।
गर्मा-गर्मी और विवाद में हम यह भूल जाते हैं कि इस विधेयक में केवल उत्तराधिकार और विवाह संबंधी उपबंध ही नहीं हैं। हमने एक समान कानून और कानून की सम्पूर्ण प्रणाली बनाने का प्रयास किया है। कानून या संहिता की इस सम्पूर्ण प्रणाली में विसंगतियों, अमानताओं और अन्याय को दूर करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर आज ही डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में बताया था कि संरक्षणता, भरण-पोषण, दत्तकग्रहण आदि सबक उपबंध किस प्रकार लाभदायक हैं। जो इस विधेयक के पूरी तरह विरोध में हैं, उन्होंने इस विधेयक के अच्छे और अविवादास्पद पक्ष पर ध्यान नहीं दिया है और पूरा ध्यान इस विधेयक का विरोध करने पर केन्द्रित रखा है।
जहां तब उत्तराधिकार संबंधी उपबंध का संबंध है, बड़ी संख्या में लोगों ने इसका विरोध किया है।
श्री तजामुल हुसैनः इसका विरोध लोगों ने निहित स्वार्थों से किया है।
श्रीमती सुचेता कृपलानीः बड़ी संख्या में लोगों ने इसका विरोध किया है। उन्होंने संयुक्त परिवार के टूटने और स्त्री के अत्यंतिक अधिकार के संबंध में विरोध किया है। मैं पहले दूसरे मुद्दे के बारे में बताती हूँ। हम एक ऐसे समाज का निर्माण करने जा रहे हैं, जिसमें स्त्री और पुरुष और सभी जातियों के लोग समान होंगे। एक पूर्ण प्रजातंत्र लाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका सपना हम वर्षों से देख रहे हैं। हम स्त्री को समाज में समान दर्जा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम लिंग भेद को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और यह प्रतिज्ञा नया संविधान लागू करने से ही नहीं शुरू होगी। मैं आपको याद दिलाना चाहती हूँ कि ये प्रतिज्ञाएं कराची संकल्प में भी शामिल की गईर्ं थीं। इसके बाद हमने कार्यभार संभाला है और इसके बाद पुनः यह दोहराया गया कि